छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 725, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिया है। बादशाह के बहादुरगढ़ पर आक्रमण करके युद्ध करने की तैयारी हम कर रहे हैं। औरंगजेब जैसे मगरमच्छ के मुँह में से आपको निकाले बिना हम कैसे शान्त बैठ सकते हैं?'' आगे जो लिखा था उसे पढ़कर महाराज का कलेजा काँप गया। महारानी ने लिखा था, "महाराज, आपके बन्दीखाने का रास्ता मेरे मायके से होकर गया है, यह हमारा दुर्भाग्य है। महाराज, आप अपनी येसू को माफ कर दें।" राजा बहुत समय तक चिन्तन-मनन करते रहे। मियाँखान अपने साथ दो बीजापुरी ब्राह्मणों को वेष बदलकर ले आया था। ये दोनों बहुत बुद्धिमान थे। उनसे महाराज ने कहा, "हम जो कुछ कह रहे हैं उसे बहुत सँभालकर कान में रखो। यहाँ से बाहर जाने के बाद सावधानी से उसे स्मरण करो और जो कुछ मैंने जिस रूप में कहा है उसे उसी रूप में रायगढ़ भेज दो। समाचार के साथ प्रमाण के लिए मैं अपनी अँगूठी दे रहा हूँ। इससे समाचार इच्छित स्थान पर पहुँच जाएगा।" महाराज ने बोलना आरम्भ किया— "येसूरानी! मन दुखी मत हो। जो समय हमारे सामने आया है वह किसी भी व्यक्ति की गति को रोक सकता है? यह मस्तिष्क को बेचैन कर देने वाला समय है। किन्तु समय अभी समाप्त नहीं हुआ है। हमें आशा है कि मुसीबतें अभी भी टल सकती हैं। किन्तु येसूरानी, अपने मायके वालों को व्यर्थ में दोष मत दो।" आगे का वाक्य बोलते हुए सम्भाजी राजा बहुत बेचैन हो गये। "गणोजी की हरामखोरी के लिए अपने शिर्केकुल को भी दोष न दो। हम रायगढ़ पर सत्ता ग्रहण करने जा रहे थे तब हमारे साथ आपके पिता पिलाजीराव पहाड़ बनकर खड़े थे। महाराष्ट्र की सबसे कार्यकुशल महारानी के रूप में जिस येसूबाई ने सात-आठ वर्षों तक रायगढ़ का कार्यभार सँभाला, उसे जन्म देने वाले कुल को कौन बुरा कह सकता है? येसूरानी, कुल बुरे नहीं होते। यह तो इनसान है जो इतना दगाबाज, समझ में न आने वाला और अकल्पनीय होता है। मिट्टी में कीड़े तो रहेंगे ही और भव्य महलों में भी नाले तो होते ही हैं। आप इसी तरह हिम्मत से खड़ी रहें। हमारी ओर से अगला संकेत मिलने तक सह्याद्रि में बने अपने अजेय किलों को खोना मत।" "मेरी चिन्ता में आपका हृदय विदीर्ण हो गया होगा। किन्तु मेरी चिन्ता रंचमात्र न करें। हमारे पूज्य पिताजी ने महाराष्ट्र के माथे पर अपना चिह्न गोदवाया है। उसे सुरक्षित रखने के लिए यदि आवश्यक हो तो अपनी माँग का सिन्दूर पुछाने के लिए भी आप तैयार रहना। किसी भी स्थिति में अपने किलों का अधिकार शत्रु के हाथ में न जाने पाए।" सम्भाजी :: 723