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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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आठ जब कैदखाने के लिए दुर्गाबाई, राणूबाई और दस वर्ष की राजकुमारी कमलजा निकलीं तो अपने प्रिय व्यक्ति से मिलने की उत्सुकता में वे विकल हो गयी थीं। उनका मन स्थिर नहीं था। एक दशक के सुदीर्घ विरह और असह्य दूरी निश्चित रूप से भयंकर थी। पिछली रात मियाँखान ने दुर्गाबाई से कहा था, "लगता है दुष्ट बादशाह का पत्थर दिल पिघल जाएगा और आप अपने प्रिय सम्भाजी से मिल सकेंगी। इसके बाद तीनों को पूरी रात नींद नहीं आयी।" आज वे तीनों बड़ी उमंग से निकली थीं। बन्दीखाने के आसपास पाँच हजार पहरेदार अपनी नंगी तलवारें नचाते हुए बड़ी सावधानी से पहरा दे रहे थे। घासफूस से बनाया गया बन्दीखाना बहुत गन्दा था। जंगल में खुले हाथियों को बाँधने के लिए भी ऐसा कैदखाना किसी ने नहीं बनाया था। उन तीनों को नदी के किनारे की ओर से वहाँ ले जाया गया। वहाँ की गन्दगी देखकर वे तीनों भौंचक रह गयीं। धड़कते दिल से वे तीनों मामने देखने लगीं। सामने जमीन पर मटमैला-सा फटा-पुराना कपड़ा बिछाया गया था। यह नहीं मालूम पड़ रहा था कि चीथड़ा मिट्टी पर है या मिट्टी चीथड़े पर। उस चीथड़े की तरह ही सूखे हुए, बहुत थके हारे सम्भाजी राजा और कवि कलश बाँस की दीवार के सहारे बैठे थे। वे लगभग अचेत अवस्था में दिखाई पड़ रहे थे। राजा के शरीर के कपड़े फटे हुए और उनका रंग उड़ गया था। हाथ-पैर जंजीरों से बँधे थे। जुलूस, यातनापृर्ण समय, हाथ-पैर में लगे घाव, ऊँट की नंगी पीठ पर बैठने के कारण कमर की छिली चमड़ी, शरीर पर जगह-जगह जमे खून, काले नीले दाग आदि शरीर पर यातना के चिह्न की तरह दिखाई पड़ रहे थे। वे दोनों अचेतावस्था में अधमरे से पड़े थे। वहाँ अँधेरे के साथ बदबू भी बहुत थी। राणूबाई को हीरे-मोती की मालाओं से सजाए गये घोड़े पर बैठकर, रायगढ़ पर चलने वाले अपने छोटे भाई का स्मरण हो आया। आज उसी राजकुमार को 'इस अवस्था में देखकर उनके पेट में भय का गोला घूमने लगा। जैसे नदी की ऊँची कछार पर गाय का बच्चा अटक जाये और दूसरी ओर कछार पर अटकी गाय चिल्लाए, उसी तरह राणूबाई जोर से चीखीं, "शम्भूऽऽ, बाल राजाऽऽ...शम्भुराजाऽऽ।" राजा के कानों पर यह मीठा स्वर दस वर्ष बाद पड़ा था। अपनी बहन की उस 724 :: सम्भाजी