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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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व्याकुल तड़प को सुनकर सम्भाजी झट से उठकर खड़े हो गये। क्षणभर के लिए उनके शरीर के घाव और उनसे उठने वाली पीड़ा लुप्त हो गयी। शरीर से बँधी जंजीर बजी और सम्भाजी आगे दौड़े। उन्होंने राणू दीदी को बाँहों में भर लिया। रायगढ़ के राजकुमार, शिवाजी महाराज के पुत्र और अपने सुहाग को भिखारी से भी बदतर अवस्था में देखकर दुर्गाबाई का धैर्य छूट गया। उन्होंने राजा के थके हुए मांस के गोले जैसे शरीर को अपनी बाँहों में भर लिया। वे दहाड़ें मार-मारकर चिल्लाने लगी, "महाराजऽऽ महाराजऽऽ। दस वर्ष की कमलजा आजतक मराठों के राजा, अपने पिता की शौर्य गाथाएँ सुनती आ रही थी। अपने पिता पर आये इस वज्रघाती प्रहार और दुर्भाग्य की दारुण दशा को देखकर वह टूट गयी थी। राजा के शरीर का जो भी हिस्सा उसकी पकड़ में आया उसी से लिपटकर वह भी रोने लगी। वह भी चिल्लाने लगी, "पिताजीऽऽ, पिताजीऽऽ!" जिस प्रकार तेज तूफान आने पर बकुल वृक्ष के सर्वांग से पुष्प झरने लगते हैं, उसी प्रकार इन चारों का अविरल अश्रुपात हो रहा था। दुख की इस वर्षा ने सभी को भिगो दिया। राणूजीजी और दुर्गाबाई को अभी भी रोना आ रहा था। सम्भाजी ने कहा, "राणू दीदी ! कितना बुरा समय है यह ? इस दुर्भाग्य ने हमें कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया। नहीं तो राणू दी औरंगजेब की चमड़ी उतारकर उसमें भूसा भरने, उसके मांस को गिद्धों के सामने फेंकने और मनुष्य के साथ भगवान को भी मुक्त करने का हमारा पक्का संकल्प था।" "शम्भुराजा, क्या कहूँ कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है। एक न एक दिन यह दुष्ट समय समाप्त हो जाएगा, हम रायगढ़ वापस आएँगे और अपने भाई को स्वर्ण सिंहासन पर बैठा हुआ देखेंगे। हमने यही एक सपना मन में पाल रखा था। इसी नशे में दस वर्षों का सुदीर्घ कारावास हमने आराम से काट लिया।" राजा के नेत्र भीग गये। वे व्याकुल होकर बोले, "क्षमा करें दीदीजी और दुर्गा रानी ! आपलोगों के लिए हम कुछ भी नहीं कर सके।" "ऐसा न कहें शम्भुराजा, बहुत लड़े आप; उस पापी औरंगजेब पर आप भरे बादल की तरह फट पड़े।" राणूबाई ने कहा। "हम राजबन्दिनी महिलाएँ होते हुए भी यहाँ की तेज गतिविधियों से हवा के रुख को समझती थीं।" दुर्गाबाई ने कहा। "इतना ही नहीं, औरंगजेब की फौज के साथ घूमते समय हमारी और कान खुले ही थे। पिछले सात-आठ वर्षों में मुगलों के आदमी ही नहीं जानवर भी आपकी दहशत से डर के मारे सहम जाते थे। आसमान में तारे भी चमकते तो बादशाह के जानवरों को तारों की जगह भाले और बर्छियाँ दिखाई देती थीं।" सम्भाजी :: 725