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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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शम्भूराजा ने अपने हृदय की गहन वेदना को व्यक्त करते हुए कहा, "दुर्गा, राणूदीदी और बेटी कमलजा, आप तीनों को स्वराज्य में वापस ले आने के लिए हमने जान की बाजी लगा दी थी। बहुत बार अहमदनगर किले के आसपास हमारी दस-दस, बीस-बीस हजार की फौजें चक्कर काटकर आयी, हंबीरमामा ने भी बड़ी कोशिश की। अन्त में किले की खाई की बगल से एक सुरंग बनाने की गुप्त योजना हमने तैयार की। किन्तु शत्रु को खतरे की भनक लग गयी। उसने आपलोगों को बहादुरगढ़ भेज दिया। ईश्वर ने और भाग्य ने साथ दिया होता तो दो महीनों में आपलोग राजधानी पहुँच गये होते। उस समय हम स्वयं को कितना भाग्यवान समझते ?" कितनी बातें करें ? क्या बातें करें? सभी की स्थिति वर्षा में भीगी बेल की भाँति हो गयी थी। अपने पिता के फटे कपड़ों, आधे-अधूरे बढ़े सिर और दाढ़ी के बाल देखकर कमलजा घबरा गयी थी। किन्तु पिता की आँखों में तेज देखकर उसका मन गर्व से खिल उठा। महाराज ने कमलजा को अपने पास बुलाया। अपने जख्मी हाथों से पकड़कर बड़े प्यार से चूमा। उन्होंने अपनी बेटी को बाँहों में भर लिया और सीने से चिपका लिया। वे बड़े अधीर स्वर में बोले, "बेटी, कितनी बड़ी हो गयी तुम? यदि हम रायगढ़ पर होते तो हम अपनी लाड़ली बेटी का किसी राजकुमार के साथ बड़े ठाट बाट से विवाह किया होता ? मंगल अक्षतों के साथ गढ़ पर तोपों की गड़गड़ाहट हुई होती।" राणू दीदी ने सम्भाजी राजा के बालों में अपनी उँगलियाँ घुमाईं। वहाँ भी आधे-अधूरे बढ़े बालों में घावों के निशान दिखे। वे सान्त्वना के स्वर में बोलीं, "शम्भूराजा धीरज रखो। ये दिन भी कट जाएँगे।" "दीदीजी! समय ने इतने कठोर तमाचे हमें ही मारे ? यह कैसी घात करने वाला समय आया है। यह कितना मनहूस समय है ? अपनी इस बिटिया को इससे पहले हमने कभी देखा ही नहीं। आज पहली बार उसे सीने से लगाकर हृदय आनन्दित हो गया। किन्तु यह भी कैसा दुर्भाग्य ? दुनिया के इतिहास में होगा कोई ऐसा राजा जो अपनी प्यारी बेटी को दस वर्ष के बाद मिल पाया हो ? अपनी राजकन्या के साथ दस वर्ष बाद मिलना और वह भी फिर कभी न मिलने के लिए।" सम्भाजी की बात सुनकर सभी का कलेजा दहल गया। इतने में ही पहरेदार दुलारसिंह यमदूत की तरह अन्दर झाँका। गला साफ करके ऊँची आवाज में बोलने लगा, "जल्दी करो! आपलोगों के लिए समय बहुत कम है।" पहरेदार के शब्दों में दुष्टकाल का चेहरा दिखाई पड़ने लगा। उस लोकोत्तर मिलन में पलभर के लिए 726 :: सम्भाजी