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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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सहायता लेकर वह हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहा था। जुल्फिकारखान और शहजादा आजम सह्याद्रि की घाटियों में पहुँच अवश्य गये थे। किन्तु उनकी सफलता का कोई समाचार मिल नहीं रहा था। भाग्य ने औरंगजेब को बेहाल कर दिया था। रात को खाना खाते समय औरंगजेब बिना भूले बेगम उदयपुरी और शहजादी जीनतउर्न्निसा को अपने पास बुला लेता था। उनसे अपने मन की बात कहने में उसे हल्कापन महसूस होता था। आज बादशाह की मुद्रा कुछ ठीक नहीं दिखाई दे रही थी। उसने चिढ़े हुए स्वर में अपनी शहजादी से कहा, "जीनत, हमारे कर्मचारियों ने बहुत कोशिश की, किन्तु वह निकम्मा काफिरबच्चा तो एकदम उल्टी खोपड़ी का निकला।" "क्यूँ अब्बाजान?" "वह पत्थर जरा भी नहीं पिघलता। खुफिया लोगों से पता चला है कि सम्भा की औरत, बहन और बेटी भी बहुत जिद्दी और घमंडी हैं। ये सबकी सब फाँसी के तख्ते पर चढ़ने को तैयार हैं किन्तु समझौता नहीं करना चाहतीं।" "अब्बाजान धीरज रखिए सब कुछ ठीक हो जाएगा।" "नहीं बेटी, सम्भा तो शैतान ही है। अपनी आँखों की कोर में उस जहन्नमी के लिए जरा भी रहम रखने की भूल मत करो।" बादशाह के कान बाहर भी लगे थे। पिछले दिन से शहाबुद्दीनखान बे लगाम होकर बोल रहा था। बादशाह उसे किसी प्रकार समझाने की बात सोच रहा था। तोला माशा का सन्तुलन रखने वाली बेगम उदयपुरी कुछ दूरी पर थीं। उन्होंने बादशाह और शहजादी के संवाद में भाग नहीं लिया था। इसी बीच कुछ खुफिया और दासियाँ बाहर से आयीं। उनसे खड़े खड़े बात करके बेगम उदयपुरी अन्दर आयीं। उस समय उनकी मुखमुद्रा क्रोध से लाल हो गयी थी। बेगम उदयपुरी क्रोधावेश में बादशाह के सामने आकर खड़ी हो गयीं। बादशाह की आँखों में आँखें डालकर बेगम बोली, "बादशाह सलामत! आदमी की जोर जबरदस्ती की कोई सीमा होती है कि नहीं? एक समय दारा जैसे पवित्र और जिन्दादिल शहजादे के साथ मेरी शादी हुई थी। उसका कत्ल करके और सिंहासन से हटाकर आपने मुझे छीन लिया। तख्त तो लकड़ी का था वह बेचारा क्या करता? किन्तु मेरी भावनाओं की आपने कभी परवाह की? कभी नहीं, किन्तु वह सब कुछ चुपचाप पीकर मैं पूरी जिन्दगी बादशाह की इच्छानुसार जुर्मों की सेज सजाती रही। क्या मैंने कभी विरोध किया?" "खामोश बेगमऽ तुझे आज हो क्या गया है?" औरंगजेब भयंकर रूप से सन्तप्त होकर कभी उदयपुरी और कभी शहजादी की ओर देखने लगा। "सुनने दीजिए शहजादी को। वह कोई नासमझ बच्ची नहीं है। किन्तु सम्भाजी :: 729