छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 750, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंका जीवन केवल बत्तीस वर्ष होने का प्रजा को बहुत दुख था। येसूबाई महारानी पर तो मानो पहाड़ ही टूट पड़ा था। जैसे किसी ऊँचे पहाड़ से फिसलकर हिरन नीचे गिर जाये और उसकी मृत देह को देखकर हिरनी पागल होकर छटपटाए, अपने हृदय की असह्य वेदना को दबाकर नाचने लगे, वही स्थिति येसूबाई महारानी की हो रही थी। जो जन्म से राजा और प्रवृत्ति से राजर्षि था, ऐसे अपने प्राणप्रिय पति के भाग्य में ऐसा दुर्दिन आएगा ? इसकी तो कल्पना तक नहीं थी। महारानी को सम्भाजी राजा की स्मृतियाँ बार-बार आती थीं। क्रूरकर्मा औरंगजेब चुप बैठेगा इसका विश्वास नहीं होता था। शम्भुराजा भी किसी तोड़ जोड़ या समझौते के लिए तैयार न थे। इसलिए मन के भीतर मृत्यु का घंटा बजता सुनाई पड़ता था। कराल काल का भयानक दरवाजा करकरा रहा था। महारानी को रोज का कार्यव्यापार-पत्राचार, लेना-देना, हर किले के किलेदारों और सरदारों का धैर्य बँधाना, जहाँ आवश्यक हो वहाँ सेना को पहुँचाना, रायगढ़ को निवाले की तरह निगलने के लिए तत्पर जुल्फिकारखान के आक्रमण को रोकने का प्रबन्ध आदि करना पड़ रहा था। महारानी को राजमहल खाने को दौड़ता था। चौकियों के पहरे के निरीक्षण के निमित्त से वे कभी-कभी बाहर निकलती थीं। साथ में ताराबाई, खंडो बल्लाल और अन्य लोग होते थे। वे रायगढ़ के बुर्जों से सामने के गहन अँधेरे को देखती थीं। उन्हें लगता था कि इस तहीभूत अँधेरे को ही अपने पास बुला लें। महाराज कब मिलने वाले थे ? इस जन्म में या दुर्देव से अगले जन्म में ही। सिर के ऊपर आकाश चन्द्र की ओर वे देखती ही नहीं थीं। यदि कभी असावधानी से चन्द्र दर्शन हो जाता तो उनका मन शम्भुराजा की स्मृति में पागल हो जाता था। येसूबाई के माथे का सौभाग्य सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। क्रूरकर्मा औरंगजेब पीछे हटने को तैयार नहीं था। ऐसी खबरें आ रही थीं कि औरंगजेब की सेना बहादुरगढ़ छोड़कर तुलापुर की ओर बढ़ रही है। आसपास की घाटियों में आकर स्वराज्य के बुर्जों को ध्वस्त करने का निश्चय बादशाह ने कर लिया है। अनेक अनुभवी और सम्मानित लोग अपने स्वार्थ की रोटी सेंकने और जागीर के टुकड़े के लिए औरंगजेब के तम्बू की ओर दौड़ लगा रहे हैं। ऐसे समय में सह्याद्रि की घाटियों के साढ़े तीन सौ किलों की रक्षा करना आवश्यक है। यही सोचकर येसूबाई रात-दिन एक करके हिम्मत के साथ आये हुए संकट का मुकाबला कर रही थीं। सम्भाजी राजा की मियाँखान और कुछ अन्य मुगलों से मैत्री थी। यह बात 748 :: सम्भाजी