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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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किसी को ज्ञात न थी। इससे आधे-अधूरे ही सही किन्तु राजा के सन्देश रायगढ़ तक पहुँच जाते थे। इधर शम्भूराजा के सन्देशों में प्रयुक्त निर्वाण की भाषा से येसूबाई बहुत विकल हो गयी थीं। राजा का सन्देश आया था, "येसूरानी! मेरे द्वारा बताए गये सन्देश के अनुसार कलिकाल का मुकाबला करने के लिए तैयार रहिए। महाराष्ट्र के माथे पर पिताजी द्वारा गोदवाए गये स्वराज्य के गोदने की रक्षा के लिए अपने माथे का कुंकम पोंछने के लिए आप तैयार रहिए। मुझे भूलिए और राज्य को सँभालने की तैयारी कीजिए।" ग्रह-नक्षत्र विपरीत हो गये थे। मराठों पर काल उलट गया था। फिर भी जलते घरों की अग्नि पर अपने स्वार्थ का बैंगन भूनने वालों की कमी नहीं थी। येसूबाई के मन में यह तिलमिलाहट थी कि किसी तरह यह कराल काल बदल जाये और राजा फिर से स्वराज्य में लौट आयें। एक दिन सिर नीचे झुकाए पुनवड़ी के बड़े व्यापारी कान्तासेठ बिहारीमल आये। उनके साथ बारामती के जीवाप्पा नाइक, तुकोबा सोन साखले जैसे व्यापारी थे। इनकी पीढ़ियाँ पुणे में थीं। गोलकुंडा, बीजापुर और औरंगजेब के बाजारों में उनका व्यापार चल रहा था। ये सभी लक्ष्मीपुत्र रायगढ़ पर महारानी से मिले। वे धीमे स्वर में महारानी से कहने लगे, "बादशाह के खजानची रूहूल्लाखान और उनके तीन सौ बाजारों के साथ हमारा रोज का सम्बन्ध है। हमारी मध्यस्तता से महाराज के प्राण अभी भी बचाए जा सकते हैं।" महारानी ने उन पर दृष्टि डाली। ऐसी कल्पना सुनने में भी बहुत मधुर लग रही थी। कान्तासेठ और उनके साथियों ने धीमे स्वर में किन्तु आशापूर्ण स्वर में कहा, "बादशाह की फौज के अधिकारी बहुत भ्रष्ट हैं। यह बात आपके कान तक भी आयी होगी।" येसूबाई एक क्षण के लिए रुकीं, किन्तु तुरन्त खंडो बल्लाल की ओर देखते हुए बोलीं, "खंडोबा इस कार्य के लिए इन्हें जितना धन चाहिए दे दीजिए।" महारानी दरबार से उठीं। किन्तु उनके पैर ठिठक गये। इस कार्य में उनके साथ विश्वासघात होने की पूरी सम्भावना थी। उन्होंने अनुभव किया कि इस मंडली की आँखों में विश्वास का कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ रहा था। महारानी के पीछे-पीछे आकर ताराबाई भीतरी दालान में उनसे बोलीं, "दीदी, यह धन चोरों की झोली में जाने की ही अधिक सम्भावना है।" "तारा, मेरी भी समझ में ऐसा ही कुछ आ रहा है। परन्तु यदि इस अन्धी सम्भावना का आधार पकड़कर महाराज के प्राण बच सकें तो?" "मुझसे भूल हुई, दीदी। दादासाहब के प्राणों के सामने मुट्ठी भर द्रव्य की क्या कीमत?" पैसे देकर काम सिद्ध करने के नाम पर ये महानुभाव मोटी-मोटी थैलियाँ सम्भाजी 749