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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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और कर्तव्यनिष्ठ हैं। सिंहासन पर उन्हें ही बिठाएँगे।' जिस दिन यह निर्णय लिया गया उसी दिन छोटेखाँ ने राज्याभिषेक की सभी विधियाँ पूरी कर लीं। राजाराम साहब हिन्दवी स्वराज्य के तीसरे छत्रपति बन गये। उन्होंने कृतकृत्य भाव से अपनी बड़ी भाभी का वन्दन किया, उनका आशीर्वाद लिया। समय के साथ रायगढ़ के आसपास फन्दा कसता जा रहा था। जुल्फिकारखान ने आसपास के अनेक जंगली एवं घाटियों के रास्ते रोक दिए थे। शत्रुओं की सेना एक दिन रायगढ़ के बिलकुल समीप पहुँच गयी। किले का संरक्षण करने वाली घेराबन्दी, किले के मुख्यद्वार, चितदरवाजे से अन्दर सरक गयी। अनेक घायल और रक्तरंजित घुड़सवार किले की ओर भागे। उनके विकृत चेहरे देखे नहीं जा रहे थे। बाहर निकलने का एकमात्र मार्ग भी बन्द हो गया था। इस प्रकार का भयानक संकट राजधानी रायगढ़ पर पहले कभी नहीं आया था। अधिकारी, कर्मचारी और प्रजाजन सभी चिन्तित हो गये। वे सोच रहे थे कि यदि शिवाजी महाराज का दूसरा उत्तराधिकारी भी मुगलों के हाथ लग गया तो स्वराज्य समाप्त ही हो जाएगा। सारा कार्यव्यापार समाप्त हो जाएगा। किन्तु प्रश्न यह था कि इस भयानक चक्रव्यूह से निकलें भी तो कहाँ? और कैसे? मुख्यद्वार चितदरवाजा से महाद्वार की ओर निकलने के अतिरिक्त दूसरा कोई अन्य मार्ग न था। इस मार्ग के अतिरिक्त एक बार एक स्त्री जिसका नाम हीरकणी था, दूसरे रास्ते से किले से नीचे उतरी थी। यह बड़े जोखिम का काम था। किन्तु शिवाजी महाराज ने उस रास्ते को भी बन्द करवा दिया था। रायगढ़ के पंछी, हवा और वर्षा के पानी की बात छोड़ दें तो किले से बाहर जाने के लिए मुख्यद्वार के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं था। उस दिन सन्ध्या समय ताराबाई और येसूबाई ने जगदीश्वर का अभिषेक किया। उनकी पालकियाँ मन्दिर से राज्यप्रासाद की ओर चलीं। रास्ते में किले पर ब्राह्मणबाड़ा था। वहीं पास में गड़ेरियों के घर थे। उनकी भेड़ें बेंऽऽ बेंऽऽ करती हुई अपने बाड़े की ओर लौट रही थीं। भेड़ों के पचीस तीस छोटे मेमने बड़े-बड़े झाबों के भीतर ढकेले जा रहे थे। राज्यप्रासाद के पन्त, कर्मचारी, पहरेदार सभी चिन्तामग्न थे। सभी की एक ही चिन्ता थी कि मुगलों के फन्दे से राजपरिवार को कैसे बचाया जाए? महारानी के कानों में अभी भी भेड़ों के बच्चों का मिमियाना अनुगूँजित था। उन्होंने सैनिकों को बुलाया। सैनिक गड़ेरियों के बड़े बड़े झाबे लेकर आये। आधी रात को बाघ दरवाजे के पिछले बुर्ज से रस्सी लटकाई गयी। कुछ सैनिकों को झाबे में बैठाकर नीचे उतरने का घातक अभ्यास कराया गया। दूर जंगल में मुगलों की फौज में जलती मशालें दिखाई पड़ रही थीं। उनकी गतिविधियाँ चालू थीं। येसूबाई सम्भाजी :: 751