छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगले लगाने के लिए हम अधीर हो रहे हैं। इस सम्भा की मृत्यु से यदि मृतप्राय महाराष्ट्र जागृत हो सके, आलमगीर बादशाह की कब्र यहीं दक्षिण में बनाई जा सके, तो ऐसी मृत्यु को मैं सौभाग्यशालिनी मानूँगा।" अठारह नदी के किनारे से आवाजें आने लगीं। सवेरे-सवेरे ठंडी हवा तेजी में बह रही थी। सम्भाजी राजा की आँख के सामने अँधेरा था। उन्हें दिन और रात के परिवर्तन का चराचर की हलचलों से ही पता चलता था। सवेरे वक्त उन्हें बड़ी प्रगाढ़ और शान्तिमयी नींद आयी थी। कुएँ के भीतर बुलबुल की तरह सम्भाजी राजा की आवाज फूटी- "कविराज- ?" कविराज के कानों से आवाज टकराई। उनके मुंह में जीभ नहीं थी। आँखों का गोलक समाप्त होकर केवल कोटर बचा था। उन दोनों राजबन्दियों के मन में अन्न-पानी के प्रति कोई आकर्षण शेष न था। बादशाह के दुष्ट सैनिक उनके बालों को पकड़कर बेरहमी से झटकते थे। किसी प्रकार जीवित बनाए रखने के लिए चुल्लू-भर दूध पिलाते थे। दोनों ही बहुत दुर्बल हो गये थे। सम्भाजी राजा के नेत्र गर्म सलाई से खोदकर निकाल गये थे। औरंगजेब का अनुमान था कि इन यातनाओं से थककर ये लोग जिन्दगी की भीख माँगेंगे। मृत्यु का भय उन्हें विवश करेगा। इसी आशा में सम्भाजी राजा की जबान अभी तक नहीं काटी गयी थी। सम्भाजी राजा उदासी से हँसे। उनके कविराज शब्द के उच्चारण पर एक मानवीय रक्त-मांस का फटेहाल जीवित गोला उनकी ओर सरका। राजा ने उस घिसटते कवि-कलश का हाथ अपने हाथ में ले लिया। उन्होंने कहा- "पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात। देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात।। मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले की भाँति क्षणभंगुर है। देखते-देखते यह प्रभातकाल के तारे की तरह लुप्त हो जाता है। उसके लिए दुख और खेद कैसा? हम एक दृष्टि से भाग्यशाली हैं। कल रात हवा का झोंका बनकर मेरे पिताजी आये थे। बहुत प्रेम से मिले। बहुत समय तक हम दोनों के बीच कुशल-क्षेम चलता सम्भाजी · 759