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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

गले लगाने के लिए हम अधीर हो रहे हैं। इस सम्भा की मृत्यु से यदि मृतप्राय महाराष्ट्र जागृत हो सके, आलमगीर बादशाह की कब्र यहीं दक्षिण में बनाई जा सके, तो ऐसी मृत्यु को मैं सौभाग्यशालिनी मानूँगा।" अठारह नदी के किनारे से आवाजें आने लगीं। सवेरे-सवेरे ठंडी हवा तेजी में बह रही थी। सम्भाजी राजा की आँख के सामने अँधेरा था। उन्हें दिन और रात के परिवर्तन का चराचर की हलचलों से ही पता चलता था। सवेरे वक्त उन्हें बड़ी प्रगाढ़ और शान्तिमयी नींद आयी थी। कुएँ के भीतर बुलबुल की तरह सम्भाजी राजा की आवाज फूटी- "कविराज- ?" कविराज के कानों से आवाज टकराई। उनके मुंह में जीभ नहीं थी। आँखों का गोलक समाप्त होकर केवल कोटर बचा था। उन दोनों राजबन्दियों के मन में अन्न-पानी के प्रति कोई आकर्षण शेष न था। बादशाह के दुष्ट सैनिक उनके बालों को पकड़कर बेरहमी से झटकते थे। किसी प्रकार जीवित बनाए रखने के लिए चुल्लू-भर दूध पिलाते थे। दोनों ही बहुत दुर्बल हो गये थे। सम्भाजी राजा के नेत्र गर्म सलाई से खोदकर निकाल गये थे। औरंगजेब का अनुमान था कि इन यातनाओं से थककर ये लोग जिन्दगी की भीख माँगेंगे। मृत्यु का भय उन्हें विवश करेगा। इसी आशा में सम्भाजी राजा की जबान अभी तक नहीं काटी गयी थी। सम्भाजी राजा उदासी से हँसे। उनके कविराज शब्द के उच्चारण पर एक मानवीय रक्त-मांस का फटेहाल जीवित गोला उनकी ओर सरका। राजा ने उस घिसटते कवि-कलश का हाथ अपने हाथ में ले लिया। उन्होंने कहा- "पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात। देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात।। मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले की भाँति क्षणभंगुर है। देखते-देखते यह प्रभातकाल के तारे की तरह लुप्त हो जाता है। उसके लिए दुख और खेद कैसा? हम एक दृष्टि से भाग्यशाली हैं। कल रात हवा का झोंका बनकर मेरे पिताजी आये थे। बहुत प्रेम से मिले। बहुत समय तक हम दोनों के बीच कुशल-क्षेम चलता सम्भाजी · 759

रहा। उस आनन्द के प्रवाह में हम डूब गये थे। उस भेंट से शरीर इतना पावन हो गया कि मृत्यु का कोई भय नहीं रहा। अब जब चाहें वे यमदूत आ जाएँ।'' कविराज आगे सरके। राजा का खुरदुरा और थका हुआ हाथ अपने गालों के पास रखा। उनका मन भर आया। उस राक्षसी बन्दीखाने में पाशविक बेड़ियाँ भी हँसने लगीं। सम्भाजी राजा कहने लगे, "मृत्यु एक हठी मेहमान है। धक्का देकर हटाएँ तो भी दरवाजे पर पालथी मारकर बैठ जाने वाली। किन्तु अब वह कभी भी आ जाये चिन्ता नहीं है। वह जीभ लपलपाती आये, वज्रयात बनकर आये, ज्वालामुखी का लावा बनकर आये या राज्यप्रासाद का खम्भा बनकर गिरे, कोई चिन्ता नहीं है। अब इस शरीर को मृत्यु का भय रहा ही नहीं।।" बोलते-बोलते सम्भाजी राजा की नाक से गर्म श्वास निकलने लगी। उन्होंने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। वे बेचैन होकर कहने लगे, "एक ही बात की तीव्र इच्छा थी जो अधूरी रह गयी। उस पापी औरंगजेब का सिर काटकर, चितदरवाजे की देहरी के नीचे एक बार गाड़ दिया होता तो निश्चिन्त मन से हँसते-हँसते स्वर्ग की सीढ़ियाँ चढ़ा होता। इसी बात का दुख हो रहा है। जिन हाथों सुदूर कावेरी की धारा में घोड़ा कुदाया, त्रिचनापल्ली के गर्वीले पाषाणकोट की तटबन्दी में सुरंग लगाई, जिसके भय से पुर्तगालियों के वाइसराय को नाव में बैठकर जान बचाकर भागना पड़ा, जिसने सिद्दियों की पूँछ तोड़कर जंजीरे की बिल में घुसाकर रखा, औरंगजेब की पाँच लाख की फौज देहाती कुत्तों की तरह दूर-दूर से गुर्राती रही किन्तु सह्याद्रि में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं हुई। किसी दूसरे किले पर भी मुगल अधिकार न जमा सके, उसी सम्भाजी की पीठ में अपने लोगों ने ही बगावत की विषैली कटार भोंक दी। खैर, इस सम्भाजी ने जिन्दगी में कभी भी मृत्यु की चिन्ता नहीं की। मृत्यु को मैंने अनेक बार धक्का दिया है। हुआ यह कि अनेक बार मृत्यु स्वयं डरकर भाग गयी। युद्धभूमि में मृत्यु मिल गयी होती तो उसे बाँहों में भर लेता। उस रूप में जलकर खाक होते हुए सात जन्मों की कृतार्थता का अनुभव करता। किन्तु आज इस प्रकार चोर उचक्के की तरह दबे पाँव आ रही है, इसका दुख हो रहा है।" दोपहर में अचानक वाहनों की घड़घड़ाहट सुनाई पड़ने लगी। उनकी अस्पष्ट फुसफुसाहट और तीव्रगति से होने वाली हलचल से सम्भाजी राजा ने जान लिया कि वे मृत्यु दूत थे। सम्भाजी राजा सावधान हो गये। पर वे भयानक कदम दूसरी ओर ही रुक गये। कवि कलश के साथ कुछ हाथापायी सुनाई दी। ऐसा लगा कि उन शैतान यमदूतों ने कविराज को जकड़ लिया है। पदचाप दूर जाती सुनाई दी। आँखों में दृष्टि नहीं थी। किन्तु राजा के रोम-रोम अपने आत्मीय मित्र के लिए क्रन्दन कर रहे थे। सम्भाजी राजा ने कठोर स्वर में पुकारा, "ठहरोऽऽ इधर आओऽऽ।" यह 760 सम्भाजी

आवाज इतनी तेज और धारदार थी कि यमदूतों के पैर लड़खड़ा गये। वे यन्त्रवत कवि कलश को लेकर सम्भाजी राजा के सामने आ गये। दोनों की साँसों को एक दूसरे की आत्मीय पहचान थी। सम्भाजी राजा ने 'कविराजऽऽ' कहकर दहाड़ मारी। दोनों के शरीर एक दूसरे की ओर खिंचते गये। दोनों के ही हाथ पीठ पर बँधे थे। एक दूसरे के गले मिलने की दोनों की प्रबल आकांक्षा थी, किन्तु यह सम्भव नहीं था। चकमक पत्थर पर पत्थर रगड़ने से जिस प्रकार चिनगारियाँ निकलतीं उसी तरह दोनों के शरीर परस्पर सम्बन्ध स्थापित कर रहे थे। उनकी करुण श्वासों और हुंकारों ने एक विचित्र वातावरण निर्मित कर दिया था। जीभ के अभाव में कविराज बोल नहीं पा रहे थे। उन दोनों की छटपटाहट विलक्षण थी। पंखकटा जटायु भी इतना न तिलमिलाया होगा। शम्भूराजा ने रोते हुए पूछा, "कविराज, चल पड़े आप मृत्यु के महामन्दिर की ओर? मुझसे भी पहले? कितने भाग्यवान हैं आप?" कविराज की देह तमतमा गयी। औरंगजेब की दुष्ट कटार से जीभ काट दी गयी थी। किन्तु उनकी तनी नसें, खुले हुए रन्ध्र, शरीर पर खड़े रोम रोम अर्थात् पूरा शरीर बोलने लगा। श्वासों में स्वर फूटे, "हाँ राजन, मैं सचमुच भाग्यवान हूँ। इसीलिए तो आपसे पहले दौड़ पड़ा हूँ उस स्वर्ग मन्दिर की ओर। ईश्वर के दरबार से फूलों की डलियाँ लूटकर ले आऊँगा और सारे फूल आपके रास्ते में बिछा दूँगा। इतने दिनों के घोर परिश्रम के कारण आपके पैर आहत और श्रान्त हो गये हैं। इतनी सुविधा ही उन्हें दे सकूँ तो धन्य हो जाऊँगा।" यह क्षणिक स्पर्श भी अधिक देर तक सम्भव न था। उन यमदूतों ने कविराज को खींचकर अलग कर दिया। कविराज को खींचते घसीटते नदी के किनारे ले गये। औरंगजेब के जल्लादों ने दोपहर को ही सारी तैयारी पूरी कर ली थी। कविराज के हाथ पैर आदि प्रत्येक अवयव काट दिए गये। उनके अवयव एवं रक्त मांस को नदी के किनारे बिखेर दिया गया। पन्द्रह कोस की परिधि में पसरे बादशाह के शिविर में सन्नाटा छाया हुआ था। कविराज की इस अमानवीय हत्या की खबर चारों ओर फैल गयी। फौजी खेमे ने अनुभव किया कि कवि कलश पर होने वाला यह नृशंस अत्याचार, सम्भाजी राजा पर होने वाले अत्याचार का पूर्वाभ्यास था। बादशाह की फौज में काम करने वाले गरीब भिश्ती, जो मराठी थे, छिप छिप कर रो रहे थे। शिवाजी महाराज के केवल दस वर्ष बाद उनके पुत्र, महाराष्ट्र के दूसरे छत्रपति का इस प्रकार पीड़ित किया जाना उन्हें डरा रहा था। बादशाही खेमे में मृत्युदंड देने के लिए अलग एक तख्ता बनाया गया था। किन्तु कविराज और सम्भाजी राजा को वहाँ न ले जाने का निर्णय स्वयं औरंगजेब ने

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लिया था। जहाँ-जहाँ और जब-जब अवसर मिलता था; औरंगजेब यही बताने का प्रयत्न करता था कि कवि कलश और सम्भाजी राजा मामूली कैदी हैं। वह अट्टहास करते हुए कहता था कि इनकी औकात फाँसी के तख्ते पर ले जाने की नहीं है। इसी का परिणाम था कि कविराज के शरीर के टुकड़े भीमा नदी के किनारे फेंक दिये गये थे। यह खबर फैल गयी कि सम्भाजी को मृत्युदंड बादशाह के सामने दिया जाना था। इसी के लिए बादशाह निकल चुका था। इसकी खबर मिलते ही असदखान ने खेमे के दरवाजे पर ही उन्हें रोक लिया। असदखान ने कहा, "जहाँपनाह, आप बार-बार कहते हैं कि सम्भा एक मामूली कैदी है उसकी ऐसी क्या औकात कि उसकी सजा अमल में लाते समय स्वयं किबलाए आलम वहाँ उपस्थित हों ?" बादशाह ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। वह रुका भी नहीं। उसकी सवारी तीव्रगति से नदी की ओर चल पड़ी। बादशाह नदी के किनारे पहुँच गया। भीमा नदी में सूर्य का बिम्ब छुपने लगा था। आसपास के तम्बुओं, डेरों, घरों के नेत्र उग आये थे। सभी की दृष्टि नदी के किनारे की ओर लगी थी। वृक्षों की डालियों में पंछी मौन हो गये थे। दो टिटहिरियाँ टीं-टीं करती हुई नदी के पाट वेग से पार करती हुई चली गयीं। बेड़ियों से जकड़े शम्भू महाराज नदी की ढाल पर खड़े थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उनकी आँखों के कोटरों से कुछ मोम जैसा द्रव बह रहा था। डेढ़ महीने के बढ़े हुए दाढ़ी के बाल कड़े होकर ऐंठ गये थे। वे योगी की मुद्रा में खड़े थे। सभी गतिविधियों में हर्ष और उन्माद का भाव दिख रहा था। इतने संकटों के बाद भी और तूफानी हवा के झोंकों में मौत की दहशत सामने होने पर भी सम्भाजी राजा गर्दन और पीठ सीधी करके खड़े थे। “चलोऽऽ बेवकूफ़ो हटो, कैदी के तो आँख ही नहीं है, उसे टोपी क्यों पहना रहे हो ?" इसके साथ ही टोपी दूर फेंक दी गयी। औरंगजेब स्वयं जाकर उस खम्भे के पास खड़ा हो गया। उसने जल्लादों को दूर हटने का इशारा किया। खम्भे से जकड़े हुए उस देह को औरंगजेब किसी उन्मादी की तरह देख रहा था। इसी नर शरीर ने पाँच वर्षों तक औरंगजेब के सिर से ताज को खिसका दिया था। इसी ने औरंगजेब को दुख, अपमान और विफलता का बोध देकर दक्खिन की खाक छनवाई थी। वही हठी विद्रोही देह आज औरंगजेब की मुट्ठी में आ गयी थी। इसका वह हार्दिक समाधान और सन्तोष अनुभव कर रहा था। खम्भे के साथ, जंजीरों से जकड़े सम्भाजी राजा की ओर देखते हुए औरंगजेब ने कहा, "जहन्नमी सम्भाऽऽ, तूने अपने बाप की अपेक्षा हमें दस गुना ज्यादा परेशान किया है, सताया 762 :: सम्भाजी

है। हमारी एक भी बात तूने नहीं मानी। कम से कम एक बार शरणागत होने की बात तू कहे, इसीलिए ही तेरी जुबान हमने सलामत रखी है। किन्तु तुमने अपनी जुबान का इस्तेमाल नहीं किया। वर्षों से मेरे साथ विश्वासघात करने वाले गद्दारों का नाम बताने के लिए भी तू तैयार नहीं है। तुम्हारी आँखों के कोटर से गोलक को निकाले आज सात दिन हो गये। तुम्हें अँधेरे के समुद्र में ढकेल दिया, फिर भी तुम्हारे अभिमानी पैर काँपे नहीं, मौत के दरवाजे पर तेरा पशुओं जैसा जुलूस निकाला गया फिर भी रायगढ़ पर तुम्हारी रानी जरा भी नहीं घबराई। किलों की चाभियाँ लेकर वह तुम्हारी जिन्दगी भी माँगने मेरे पास नहीं आयी। सह्याद्रि के पहाड़ों की भाँति तुम दोनों को कितना अभिमान है। सम्भा इसके बाद भी तुम्हें जीवित रखा जाए, इसकी कोई वजह तो नहीं बची है।" मृत्यु की दहलीज पर वह महायोगी, बिना रंचमात्र भी विचलित हुए खड़ा था। कमाल की ठसक, न हाँ न हूँ। जीवन-मरण की कल्पना से वह योजनों ऊँचे उठ चुका था। बादशाह की फौज, उसका कैदखाना, उसकी राक्षसी कुटिलताएँ आदि उसे नगण्य लग रहे थे। उसके भीतर केवल जगदम्बा, जगदीश्वर और शिवाजी महाराज की स्मृतियों का आवर्तन हो रहा था। बादशाह बड़ी दृढ़ता से कदम बढ़ाता हुआ उस तेज पुंज योद्धा के पास आकर बुदबुदाया, "सम्भा, काफिर बच्चे, मैंने पिछले आठ वर्षों में जंग ए मैदान में तुम्हारे जलवों को देखा है। उन्हें दाद देने के लिए, तुम्हारे सारे गुनाहों को माफ करके, तुम्हें राजबन्दी बनाकर उम्रकैद में रखने की इच्छा मेरे जैसे बादशाह के मन में हुई तो इसमें बुराई क्या है? इसलिए एक आखिरी मौका ले लो। हमें बता दो कि तुम्हारे हीरे-जवाहरात से भरे खजाने कहाँ हैं? यह भी बता दो कि वे गद्दार कौन हैं जो जिन्दगीभर बादशाह का नमक खाकर भी दुश्मनों का गुणगान करते रहे।" बादशाह की इस कुटिल चाल का कोई उपयोग नहीं हुआ। वह सीधी गर्दन और पीठ बादशाह के सामने जरा भी नहीं झुकी। औरंगजेब अपनी विफलता से आहत, पीड़ा भरी हँसी हँसते हुए बोला, "सम्भा, यह तो खुदा की ही मेहरबानी है कि तू धोखे से एक दक्खिनी सरदार के हाथ लग गया। नहीं तो जंगली पंछी और बहती हवा को कौन पकड़ पाता है? इससे आगे तुम्हें जीवित रखने का गुनाह हम कतई नहीं करेंगे। क्योंकि यदि इस बार मैंने तुम्हें जिन्दा छोड़ दिया तो हमें पूरा यकीन है कि तू मेरा ही खात्मा कर देगा। इस बात को तुम भी जानते हो और मैं भी अच्छी तरह जानता हूँ।" अधिक विलम्ब न करके बादशाह ने जल्लादों की ओर घूरकर देखा। उनके हाथों में धारदार तलवारें और कुल्हाड़ियाँ थीं। तलवारें और कुल्हाड़ियाँ मशालों की रोशनी में चमक रही थीं। पास ही भीमा नदी की अँधेरे में डूबी धारा थी। इस सम्भाजी 703

क्रूर शैतानी दृश्य को देखने से बचने के लिए प्रकाश अँधेरे की ओट में भागा जा रहा था। आज कुछ जल्दी ही सूर्यास्त हो गया था। कहीं से कुत्तों के रोने की आवाजें आ रही थीं। सम्भाजी राजा 'जगदम्ब, जगदम्ब' का जाप कर रहे थे। आँखों के कोटर में नेत्रकमल नहीं थे। किन्तु राजा के मन की आँखों के सामने अनेक दृश्य झिलमिलाने लगे थे। पुरन्दर पर तेज बरसाती धाराएँ, हिन्दवी स्वराज्य के छत्रपति के पुत्र के रूप में जन्म लेना, वहाँ का आनन्दोत्सव, उस गोरे-चिट्टे तेजस्वी बालक का पालने में सुलाया जाना, सोने की जंजीरों से लटकते पालने का हल्के से झुलाया जाना। जीजामाता और सोयराबाई का मधुर गीत— सोजा, सोजा शम्भू बाल शिवबा के प्राण पियारे लाल सोजा सोजा शम्भू बाल। पास पलंग पर रुग्णावस्था में सईबाई बैठी हैं। अपने श्रान्त नेत्रों से गोर चिट्टे राजकुमार को बड़े प्यार से देख रही हैं। वे बाणकोट की खाड़ी की लहरें। शिवाजी महाराज के कन्धों का सहारा लेकर तैरते राजकुमार सम्भाजी अपनी बालपन की कोमल काय पर वस्त्रालंकार संभालते, बादशाह की नजरों में सीधे देखते केवल नौ वर्ष के राजकुमार, शृंगारपुर में शिक्षा ग्रहण करते हुए अपनी सहपाठिनी येसूबाई के साथ की गयी ठिठोलियाँ, बुरहानपुर से दक्षिण में कावेरी की धारा में धँसे त्रिचनापल्ली किले की दीवारें, सह्याद्रि के साथ ही दक्षिण की प्रत्येक घाटी में देश, धर्म और मिट्टी के लिए हजारों साथी, अकाल की चिन्ता न करने वाले त्रस्त जानवर, पेट-पीठ एक हो जाने पर भी बादशाह के विरुद्ध खड़े रहने वाले तलवार और भालों से सुसज्ज बहादुर, आठ वर्षों के निरन्तर संघर्ष में मृत्यु पाने वाले असंख्य घोड़े। क्या कुछ नहीं याद आ रहा था, सम्भाजी राजा को? सम्भाजी बादशाह की कोई भी बात सुनने को तैयार न थे। यह देखकर वह भयंकर रूप से क्रुद्ध हो गया। उसने फर्सियाँ लेकर खड़े दल को एक ओर कर दिया। हाथों में बघनखा पहने दूसरा दल पास ही तैयार खड़ा था। बादशाह ने उनकी ओर इशारा किया। इशारा पाते ही वे आगे दौड़ पड़े। शम्भूराजा को खम्भे के साथ बाँध दिया गया था। दो हट्टे कट्टे राक्षस आगे बढ़े। एक ने पीठ की ओर ऊपरी मनके के पास और दूसरे ने आगे से गले के पास बघनखे घुसा दिए। उन राक्षसों को प्रोत्साहित करने के लिए ढोल-नगाड़े जोर-जोर से बजाए जाने लगे। वे दोनों 'दीनऽऽ—दीनऽऽ' करके चिल्लाने लगे। वे राजा के अंग में घुसे बघनखों को जोर 764 :: सम्भाजी

लगाकर नीचे खींचने लगे। राजा की त्वचा चर्र-चर्र करके फटने लगी। चमड़ी छिलने लगी, आँतड़ियां टूटने लगीं। उन दोनों जल्लादों के हाथों से छिलने पर रक्त के फौवारे छूटने लगे। रक्त की धारा नीचे जमीन पर गिरने लगी। सम्भाजी राजा ने अपनी जान बचाने के लिए कोई मिन्नत नहीं की। वे अपने दाँतों को बिठाकर अत्याचार को सहने का प्रयास कर रहे थे। किसी पुराने कपड़े की तरह राजा का शरीर चिन्दी-चिन्दी हो रहा था। वह रक्तरंजित गोला अपनी जगह पर थरथरा रहा था। अंगों से रक्त के फौवारे छूट रहे थे। महादेव की पिंडी पर चढ़ाया गया दूध-दही जिस प्रकार नीचे जमा हो जाता है उसी प्रकार राजा के पैरों के पास रक्त जमा हो रहा था। बकरे की तरह राजा की छिली देह को देखकर औरंगजेब खिलखिलाकर हँस रहा था। राजा का फटा हुआ जीवित शरीर अपनी जगह पर फड़फड़ा रहा था। दोनों जल्लाद सम्भाजी राजा के शरीर को छीलकर एक तरफ हो गये। उसके बाद बादशाह ने फर्सीधारी पाँच जल्लादों की ओर इशारा किया। उन दैत्यों के हाथों में हलचल हुई। दूसरे ही क्षण वे सम्भाजी राजा पर टूट पड़े। एक ने अपनी कुल्हाड़ी की तेज धार सम्भाजी राजा की गर्दन में घुसा दी। रक्त की धार उठी, आधी खोपड़ी कट गयी। गर्दन से नीचे लटकने लगी। इसके बाद ही एक दूसरा वार किया गया जिससे सिर धड़ से अलग हो गया। सम्भाजी का सिर उठाकर बादशाह के सामने लाया गया। औरंगजेब ने उसे हाथ में लिया। उसने रक्त से सनी हुई दाढ़ी पर हाथ फिराया। वह बहुत प्रसन्न था। कुछ वर्ष पूर्व उसने अपने बड़े भाई दारा की खोपड़ी भी बड़ी भावशून्य दृष्टि से देखी थी। इस खोपड़ी को असदखान को सौंपते हुए बादशाह गरजा, "इस काफिर बच्चे के सिर को भाले में लटकाकर गाँव-गाँव घुमाओ, सभी के बीच दहशत फैलाओ। यह औरंगजेब जब तक जिन्दा है तब तक दक्खन में कोई दूसरा सम्भाजी पैदा न हो।" औरंगजेब ने जल्लादों की ओर पुनः इशारा किया। वे सम्भाजी राजा पर टूट पड़े। खम्भे से जकड़े शरीर से रक्त की धारा बहने लगी। धारदार कुल्हाड़ियों से कटकर शरीर का रक्त-मांस नीचे बिखरने लगा। भीमामाई सहम गयी। अँधेरे में डूबा सगा सह्याद्रि दुःख से काँप गया। शाही हुक्म हुआ। उसके अनुसार हाड़-मांस के टुकड़े एकत्र किये गये। मुर्दाखोरों ने उन्हें भीमा नदी के किनारे फेंक दिया। कुछ टुकड़े नदी की धारा में पड़े और कुछ किनारे पर। बादशाह को अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण कार्य को पूरा करने की प्रसन्नता हुई। सम्भाजी :: 765

बादशाह सामने की कछार चढ़कर झपाटे से उस अँधेरी रात में ऊपर आया। इस विजय के लिए आलमगीर ने कितना खून पसीना बहाया था? लाखों मनुष्यों और जानवरों को मारा था, पागल कर दिया था अथवा भयंकर रोग के मुख में झोंक दिया था। थका-हारा बादशाह उस रात्रि बेला में, तुलापुर के भीमा कछार पर आकर खड़ा हो गया। उस घुप्प अँधेरे में नदी की काली धारा की ओर आहत दृष्टि से देखने लगा। बादशाह के डेरे में विजय की सूचक नौबत बजी। हर्षोल्लास से सैकड़ों तासे-ढोल एक साथ बजने लगे थे। हजारों मुगल सैनिक बाजार में खुशी से नाचने लगे थे। मशालों का नृत्य आरम्भ हो गया था। 'सम्भा मर गयाऽऽ, सम्भा कत्ल किया गयाऽ' ऐसा चिल्लाते हुए घुड़सवार जोर-जोर से शोर मचा रहे थे। यह अमावस्या की रात इन दैत्यों के लिए उत्सव की रात बन गयी। आसमान में विजय की चन्द्रज्योति प्रकाशित हुई। चारों ओर हर्षोल्लास का वातावरण छाया था। कछार पर खड़ा बादशाह आतंकित-सा बार बार नदी की धारा की ओर देख रहा था। वह क्षणभर के लिए हैरान हुआ कि कहीं वहाँ काले पानी में सम्भाजी तो नहीं खड़ा है? उसे शंका हो रही थी, किन्तु उसके आसपास त्योहार जैसा उत्सव फौज मना रही थी। शंका के लिए कोई अवकाश शेष नहीं था! समाप्त कर दिया गया काफिर बच्चा अन्ततः समाप्त हो गया था। पिछले आठ वर्षों में जिसने मुगल सेना के लाखों लोगों और जानवरों को विनष्ट करने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया था, आखिर समाप्त हो गया। उस जहन्नमी शिवाजी का दुष्ट छोकरा समाप्त हो गया। औरंगजेब बड़ी राहत का अनुभव कर रहा था। वह बड़ी प्रसन्नता से हँसा, खिलखिलाकर हँसा, बार-बार हँसा। यह सफलता इतनी बड़ी थी कि बादशाह विदूषक की भाँति खूब हँसा। धीरे धीरे उसकी हँसी बन्द हो गयी। पहला दौर समाप्त हो गया। बादशाह के अंगों में कूट-कूटकर भरा हुआ क्रूर हैवान आलमगीर के अति हिंसात्मक रूप को देखकर दूर भाग गया। बादशाह के अंग-प्रत्यंग में एक अनाम खालीपन भर गया था। वह घबराने लगा। उसे अपनी कामयाबी से ही भय लगने लगा। खालीपन उसे खाने लगा, बेचैन करने लगा। वह सोचने लगा कि यदि सम्भा सचमुच समाप्त हो गया है तो इसके बाद वह लड़े तो किसके विरुद्ध? 'बादशाह सलामत चलिए! हजरत चलिए।' इस आवाज से औरंगजेब का ध्यान टूटा। वह होश में आया। शहाबुद्दीनखान, रूहूल्लाखान, हसनअलीखान जैसे बड़े सरदार नदी के किनारे की ओर दौड़ पड़े थे। उन्हें अपने मालिक की इस दिग्विजय पर बधाइयाँ देनी थीं। रूहूल्लाखान बड़े उत्साह से बोला, "चलिए हजरत आपको मुबारकबाद देने के लिए सारी फौज बेताब हो रही है। अपने खास 766 :: सम्भाजी

सरदारों ने वहीं पर फतह की बड़ी महफिल सजा रखी है।" "वहाँ पर मरगट्टों के बड़े बड़े ब्राह्मण, जमींदार और अनेक मराठा जागीरदार खासतौर पर हाजिर हैं। चलिए, उनसे मुलाकात कीजिए।" हसनअलीखान ने साग्रह कहा। बादशाह कुछ अजीब ढंग से हँसते हुए बोला, "क्या मिलना उन मराठा कुत्तों से? जागीर की लालच में आये कुत्ते, उनकी परवाह कौन करता है?" "लेकिन, लेकिन जहाँपनाह?" "उन मूर्खों पर गर्व करने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें यदि आज धक्का मारकर बाहर निकाल दिया जाये तो कल वे फिर पैरों में पूँछ दबाए ये नामर्द फिर आ जाएँगे।" "लेकिन जहाँपनाह, फौज को आपसे एक बहुत जरूरी काम है।" इखलामखान बादशाह के नंगे सिर की ओर देखते हुए बोला। "आपके सिर पर कितने सालों से ताज नहीं—" "अँ?" "जी हाँ, मेरे आका, चलिए आपऽ। वर्षों से आपके ताजविहीन सिर को देखकर हम फौजियों को शर्म आती रही है। सम्भा का खात्मा किये बगैर सिर ताज धारण न करने की सौगन्ध आपने पाँच वर्ष पहले ली थी। कल्याण के एक विशेष सुनार से आधे करोड़ की कीमत का, हीरे जवाहरात वाला राजमुकुट हमने आपके लिए तैयार करवाया है।" "हाँ, हाँ हुजूर! चलिए आज वह मुकुट पूरी शानो शौकत के साथ आपकी खिदमत में पेश करना है।" एक साथ पाँच-छह लोग बोल पड़े। "इसकी क्या वजह है?" बादशाह ने खिन्न मन से पूछा। "आपकी इस महान बहादुरी के लिए। एक निहायत नापाक, नादान दुश्मन को आपने आज जिन्दा कत्ल कर दिया। आपने तो बहुत बडी फतह हासिल की है हजरतऽ।" अपने साथियों द्वारा की जाने वाली प्रशंसा से बादशाह ऊब चुका था। वह चलते चलते रुक गया। ऐसा लगा जैसे उसका दम फूल रहा हो। वह सोच नहीं पा रहा था कि सत्य बात को कहे या न कहे। उसके भीतर का कठोर शासक उसके पापों के द्वार पर कड़ा पहरा दे रहा था। किन्तु उसके अन्तरतम में बैठी मानवीय आत्मा द्रवित हो गयी थी। वह अपने बादशाह के अनुशासन को धोखा दिया। आँखों की पुतलियों के पीछे भरे आँसुओं को वह सँभाल नहीं पाया, उनकी सीमा टूट गयी। पहरेदारों की चिन्ता किये बिना उसकी आँखों से तीन बूँद आँसू ढरक गये, गालों से होते उसकी सफेद दाढ़ी में समा गये। सम्भाजी · 767

औरंगजेब उदास स्वर में बोला, "अरे बेवकूफोऽ कैसा जश्न मना रहे हो? मारने वाला मर गया और मरने वाला अमर हो गया। जिसने कत्ल किया वह मर गया, जिसका कत्ल हुआ वह अमर हो गया।" उन्नीस भूकम्प के बाद के उजड़े हुए कुरूप दिन की तरह वह भयानक दिन था। भीमा के तट पर कोरेगाँव परिसर में अनेक गाँवों में डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था। छह सात गाँवों के बाहरी हिस्से में फैला, तीन-साढ़े तीन लाख का फौजी खेमा दिन में भी झपकियाँ ले रहा था। संगीत और गायन-वादन के विरोधी बादशाह ने मौज मस्ती की खुली छूट दे दी थी। काफिरों के निपात के उपलक्ष्य में रातभर गाना बजाना चलता रहा। आज सवेरे देर से बादशाही खेमा जगा। वढू गाँव की स्थिति अन्य गाँवों से अलग थी। कल शाम को शम्भुराजा की नृशंस हत्या की खबर कुछ ही लोगों को थी। शेष गाँव के हट्टे कट्टे युवक अपने घरों में घायल होकर पड़े थे। दो दिन पहले ही बादशाही फौज के हत्यारे सैनिकों ने घरों में घुसकर उन्हें बुरी तरह पीटा था। पिछले पाँच-छह दिनों से गाँव में शाही फौज के घोड़े आते थे और खड़ी फसल में घुसकर उन्हें तहस-नहस कर देते थे। विशेष रूप से रूहूल्लाखान के खेमे के घोड़े खुले छोड़े जाते थे। इस ध्वंसलीला के कारण गाँव के लोग बहुत चिढ़ गये। युवकों ने लाठियाँ लेकर घोड़ों को मार भगाया। घोड़ों का झुंड नदी पार चला गया। इससे रूहूल्लाखान बहुत क्रुद्ध हुआ। उसी रात रूहूल्लाखान के दो-तीन सौ सैनिकों ने वढू गाँव पर आक्रमण कर दिया। काफिरों के युवकों का यह प्रतिशोध उससे सहन नहीं हुआ। सैनिकों ने घरों में घुसकर युवकों, बूढ़ों आदि सभी को खींच-खींचकर बाहर निकाला और चौराहों पर लाकर उन्हें मारते-मारते बेदम कर दिया। इस बात को अभी दो ही दिन हुए थे। युवकों का घायल शरीर उनका साथ नहीं दे रहा था। लोग आहत और विवश अपने घरों में पड़े थे। बादशाह के विरोध में शिकायत करें भी तो किससे? वे अपनी मार की असह्य पीड़ा झेलते हुए, अपने झोपड़ों की आड़ में निढाल पड़े थे। दोपहर बीती। गाँव के दामाजी पाटील के बाड़े से धोने वाले कपड़ों का बड़ा 768 :: सम्भाजी

गट्ठर लेकर जना धोबिन बाहर निकली। शाम होने के पहले उसे कपड़ों को धो डालना था। वह भीमा और इन्द्रायणी के संगम के बहाव की ओर गयी। नदी के पाट में अनेक जगहें निकल आयी थीं। दूसरी ओर तुलापुर के किनारे पर जगह जगह फौजियों के डेरे-तम्बू लगे थे। उस ओर नदी का स्वच्छ पानी और धोने के लिए एक बड़ा और चौड़ा पत्थर जना को दिखाई पड़ा। वह उसी ओर तेजी से बढ़ गयी। पाटील की बारहबन्दी पानी में खंगालकर धोने लगी। जना की उम्र तीस वर्ष की थी। मायका पाबल और ससुराल वढू। बचपन से ही उसने लोक गायकों से शिवाजी महाराज के पवाड़े सुने थे। इसलिए रायगढ़ के प्रति उसके मन में बड़ा आकर्षण था। विवाह से पहले उसने अपने पिता से कई बार कहा था, "तात्या आप मेरे लिए रायगढ़ के आसपास का कोई दूल्हा क्यों नहीं ढूँढ़ देते?" "इतनी दूर क्यों रे छोकरी?" पिता ने पूछा था। "वहाँ रही तो किसी न किसी दिन शिवाजी महाराज और सम्भाजी महाराज के कपड़े धोने को मिलेंगे न? ऐसा होने पर जन्म सार्थक हो जाएगा।" जना के भाग्य में वढू गाँव ही था। गाँव की धोबिन के नाते दामाजी पाटील के घर के कपड़े धोने को मिलते थे। रोज की तरह सहज भाव से उसका कार्य शुरू था। उसी समय तुलापुर गाँव का बैजा गड़रिया अपनी भेड़ों को लेकर आता दिखाई दिया। कपड़ों को और स्वच्छ करने के लिए जना थोड़े गहरे पानी में उतर गयी। कपड़ों को पानी में खँगालते समय एक विचित्र वस्तु उसके हाथ लगी। रस्सी की तरह की उस लिजलिजी वस्तु को किनारे की ओर सरकाते-सरकाते तंग आकर जना चिल्ला पड़ी। "कौन युवा है यह? आदमी है कि जानवर? बकरे की अंतड़ी को पानी में डालने की बेवकूफी लोग क्यों करते हैं?" जना की बात सुनकर बैजा गड़रिया फीकी हँसी हँसते हुए बोला, "जना वह अँतड़ी बकरे की नहीं, आदमी की है।" "हैंऽऽ? क्या कह रहे हो?" "तुम्हें पता नहीं है क्या? कल रात उस बादशाह ने शिवाजी महाराज के बेटे शम्भू महाराज को यहीं नदी के किनारे, बकरे की तरह काटा है। ध्यान से पीछे देख, उन्हीं का रक्त-मांस पीछे चटाई पर पड़ा है।" "क्या कह रहे हो, मामा?" "हाथ नहीं लगाना। घर भाग जा। शम्भूराजा के रक्त-मांस को छूना नहीं। यह बादशाह का हुक्म है। खान के सिपाही तुझे बेदम करके मारेंगे।" सम्भाजी •• 769

धोने वाले कपड़ों को वैसे समेटकर जना तत्काल पीछे मुड़ी। वह अपने गाँव की ओर सरपट भागने लगी। उसने पाटील के बाड़े में कपड़ों की गठरी को नीचे गिरा दिया। उसकी यह दशा देखकर राधाबाई पाटील ने पूछा, "क्या हो गया है, आज तुझे? कपड़े बिना धोये ही वापस लेकर आ गयी। नदी के घाट पर कोई साँप बिच्छू देख लिया क्या?" "अपने गाँव के सयानों में साहस नहीं रह गया तो क्या जाता है? वैसे ही नाग की तरह मुवों को घूमने दो।" जना ने चिढ़कर कहा। "क्या कह रही हो, जना?" "माँ जी, शिवाजी महाराज के बेटे की अंतड़ियाँ निकालकर उस बादशाह ने नदी की रेत में फेंक दी हैं। इसकी शर्म हमारे गाँव के मर्दों को क्यों नहीं आ रही है? ये मुये रणुए क्यों मूँछों पर ताव देते हैं और बाजार में सीना तानकर चलते हैं?" यह खबर सुनते ही राधाबाई पाटील के हाथ का निवाला नीचे गिर गया। पाटील के बाड़े के पास बढ़इयों के बाड़े और गाँव की चौपाल में भी यह दुखद समाचार पहुँचा। समाचार पाते ही गाँव का कलेजा दहल गया। महादेव के मन्दिर में पिछले कुछ दिनों से गोरखनाथ बाबा ठहरे हुए थे। गाँव के वरिष्ठ लोग दौड़कर गये। वे भी दुख से काँप गये। यह दुखद समाचार उनके कानों तक पहले ही पहुँच चुका था। उसी शाम को दामाजी पाटील कोरेगाँव से लौट आये। लोग आकर उनके आसपास जमा हो गये। 'दुहाई हो माई-बाप' गोपाल नाक चिल्लाते हुए आया। पुनः महादेव मन्दिर के चबूतरे पर गाँव वालों का जमावड़ा हुआ। सभी के मन उदास थे। बादशाह के कृत्य से सभी का कलेजा काँप गया था। भय के कारण उनके शरीर में कँपकँपी छूट रही थी। शम्भूराजा की हत्या के समाचार से सभी को पीड़ा हो रही थी। अनेक लोगों की आँखों में आँसू भरे थे। अपने को न रोक पाकर गोरखनाथ जी बोले, "और तो कुछ नहीं, किन्तु महाराज के बेटे का रक्त-मांस अपने गाँव की सीमा के पास पड़ा रहे और हम चुपचाप बैठे रहें, यह सोचकर दुख हो रहा है?" "आपकी बात सच है महाराज।" मन्दिर के बाहर बैठा गोविन्द नाक बोला, "शिवाजी महाराज ने इस प्रदेश में अपने बाल-बच्चों पर कुछ कम उपकार किये हैं क्या? आज उनके बेटे की अंतड़ियों के लोथड़े हमारी सीमा पर पड़े हैं और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें यह ठीक नहीं है। पाटीलजी आप सोचें।" दामाजी पाटील आस्तिक वृत्ति का व्यक्ति था। पंढरीनाथ की नियमित सेवा करता था। तुकोबा के चिरंजीव, नारायण महाराज को पिछले कुछ वर्षों से सरकारी सहायता मिल रही थी। शम्भूराजा के समय में ही देहू से पंढरपुर के लिए पालकी 770 :: सम्भाजी

यात्रा आरम्भ हो गयी थी। उसके साथ दामाजी ने चार बार यात्राएँ की थीं। गोविन्द नाक ने अपने जीवन में शम्भूराजा की बहादुरी की असंख्य कहानियाँ सुनी थीं। उसका सगा मौसेरा भाई रायप्पा नाक अपने भाई के साथ बहादुरगढ़ की ओर निकल गया था। उसे शम्भू महाराज से मिलना था। परन्तु वे दोनों भाई लौटकर नहीं आये। वहीं कहीं शहीद हो गये। शिवाजी और सम्भाजी के साथ सारे गाँव का ऐसा ही आत्मीय रिश्ता था। इसलिए सभी छोटे-बड़े तिलमिला रहे थे। आज का यह प्रसंग बहुत जटिल था। सभी की बातें सुनकर दामाजी पाटील ने निर्णायक स्वर में कहा, "भाइयो, शम्भू महाराज के लिए आप लोगों की अपेक्षा मेरे दिल में अधिक दर्द है। पर करना क्या है? गाँव के सामने ही तीन-चार लाख की फौज का घेरा लगा हुआ है। बादशाह की शक्ति असीम है। बादशाह ने फरमान जारी किया है कि शम्भू महाराज के रक्त-मांस को किसी को छूना नहीं है।" "सच है पाटील, आज दिनभर आसपास के दस गाँवों के लोग दिनभर घर से बाहर नहीं निकले। सभी भयभीत होकर सोच रहे हैं कि बादशाह के साथ बेवजह पंगा क्यों लिया जाए? अपने गाँव के साठ-सत्तर युवकों को चार दिन पहले सैनिकों ने इतना पीटा है कि उन युवकों ने अभी भी बिस्तर नहीं छोड़ा है। अब फिर गाँव में नयी मुसीबत नहीं चाहिए। पाँच कोस के क्षेत्र में अन्य सभी गाँव चुपचाप बैठे हैं तो हम ही क्यों यह आफत मोल लें?" भोजन का समय हो गया था। गाँव के पाटील ने अपना निर्णय सुना दिया। गाँव वाले अपने अपने घरों को लौट गये। वे रोटी खाकर बिस्तर में जाने की तैयारी करने लगे। किन्तु जना धोबिन बड़ी साहसी महिला थी। राधाबाई पाटील के साथ उसकी घनिष्ठ मित्रता थी। जना आज अपना दाना पानी भूलकर राधाबाई के बाड़े में ही बैठी थी। राधाबाई ने भोजन परोसते समय पुनः पाटील से निवेदन किया, "शम्भू महाराज के लिए कुछ तो कीजिए जी?" राधाबाई ने बहुत आग्रह किया किन्तु मुगल सेना के विरुद्ध खड़े होने की दामाजी की इच्छा न थी। अन्ततः बाड़े में राधाबाई और जना ही बैठे रह गये थे। राधाबाई ने गोविन्दा के द्वारा गाँव की महिलाओं को सन्देश भेजा। सन्देश पाते ही गाँव की माताएँ, बेटियाँ आदि पाटील के बाड़े में इकट्ठा हो गयीं। गाँव की उन महिलाओं को हाथ उठाकर जना ने सम्बोधित किया, "इतनी निर्दयता? दुनिया पर क्या पानी पड़ गया है? अपने गाँव के एकदम पास शम्भू महाराज के मांस के लोथड़े इस तरह क्यों पड़े रह जाएँ? पाटीलबाई, मैं तो कहती हूँ कि हमारे पूर्वजों ने पिछले जन्मों में जरूर बड़े पुण्य किये होंगे। इसीलिए तो शिवाजी महाराज का बेटा हमारे गाँव की सीमा की गोद में सोने के लिए इतनी दूर आ गया।" सम्भाजी :: 771

शिवाजी और सम्भाजी राजा के विषय में चर्चा होने लगी। उनकी स्मृतियों से महिलाओं का कलेजा काँपने लगा। रात काफी बीत चुकी थी फिर भी वहाँ से हटने के लिए कोई तैयार नहीं था। मन्दिर के गोरखनाथ बाबा को पाटिलबाई ने अपने बाड़े पर बुलवा लिया। गोरखनाथ बाबा कुछ वर्ष पहले सज्जनगढ़ पर शम्भू महाराज से मिले थे। उसकी चर्चा करते हुए बाबा को स्मरण हुआ कि स्वराज्य के युवराज कितने साहसी और उदार थे। यह चर्चा करते-करते उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं। अन्य उपस्थित लोग भी भीतर ही भीतर हिल गये। इसी बीच इस पूरे प्रसंग से व्यथित गोविन्दा नाक वहाँ आ गया। अपनी लाठी को पेट पर टिकाते हुए वह कुछ दूरी पर बैठ गया। जना क्रोध से आगबबूला हो रही थी। वह गोरखनाथ बाबा से क्रोधावेश में पूछने लगी, "बाबा, मान लीजिए कोई बड़ा भूकम्प आ जाये तो उसमें पूरा गाँव नीचे धँस सकता है कि नहीं?" "सच है।" "जंगल में जब दावाग्नि लगती है तो वहाँ के गाँव जलकर खाक होते हैं कि नहीं?" "बिल्कुल होते हैं, बिटिया।" "तो मैं कहती हूँ कि हम ऐसे ही निकलकर चलें और शम्भू महाराज के रक्त मांस को इकट्ठा करके ले आयें, उनका दाह संस्कार करें। आखिर बादशाह करेगा भी तो क्या? गाँव को जला देगा, इतना ही न?" जना की बात सुनकर राधाबाई भी उठकर खड़ी हो गयीं। उनका भी खून उबल पड़ा। इसी बीच गोरखनाथ बाबा बोल पड़े, "अपनी परम्परा के अनुसार गाँव के आसपास यदि कोई लावारिस शव पड़ा हुआ मिले तो उसे उठाकर दाह संस्कार करना चाहिए, इस प्रकार मनुष्य शरीर को मुक्ति दी जाती है। शास्त्रों और पुराणों का भी ऐसा ही आदेश है।" और यहाँ शिवाजी महाराज के बेटे के शरीर के लोथड़े पड़े हैं। फिर भी हम सारे नामर्द चूड़ियाँ पहनकर चुप बैठे हैं।" दूर से गोविन्दा की आवाज आयी। उस एकत्र भीड़ में मानो क्रोध और दुख से प्रेरित नशा चढ़ गया। सारी अबलाएँ सबला बनकर खड़ी हो गयीं। क्रोध से वे आगबबूला हो रही थीं। "चलोऽऽ, नदी की ओर चलोऽऽ" चारों ओर से शोर उठा। ये महिलाएँ डंडे, लकड़ी, मूसल जो कुछ भी मिला वह लेकर जाने के लिए तैयार हो गयीं। बाहर घना अँधेरा था किन्तु सभी माताएँ और पुत्रियाँ आँचल कमर में खोंसकर अपने लक्ष्य के लिए तैयार हो गयीं। बाड़े के भीतर उठने वाला शोर दामाजी पाटिल के कानों में पड़ा। भीतर सोये 772 :: सम्भाजी

हुए पाटील हड़बड़ी में बाहर आ गये। वे गुर्राये, "भगवान यह क्या बचपना चला रखा है? बादशाह गाँव पर गधे का हल चलाएगा तब पता चलेगा आपको।" "देखिए जी! शिवाजी महाराज के बेटे का मांस चील और गिद्धों को देने से पहले यदि हम मर जाएँ तो क्या बुरा है? ऐसा गाँव और ऐसा जीवन चाहिए किसलिए? संभालिए अपना गाँव और घर। हम तो चले।" राधाबाई पाटील ने हाथ में भाला ले लिया और बाड़े से तीर की तरह बाहर निकलीं। उनके साथ जना धोबिन और हाथ में कमंडल लिये गोरखनाथ बाबा निकले। साथ बढ़ूगाँव की सारी स्त्रियाँ भी निकल पड़ीं। गाँव की सीमा पार कर सब नदी की ओर दौड़ने लगीं। आगे आगे हाथ की लाठी नचाता गोविन्दा नाक था। नदी का किनारा समीप आने पर स्त्रियाँ बड़ी सावधानी से नदी कछार उतरने लगीं। वे नहीं चाहती थीं कि शाही फौज को इसकी भनक लगे। आसमान में घना अँधेरा था। महिलाओं ने सहजभाव से पीछे मुड़कर देखा। गाँव के सारे पुरुष उनके पीछे दौड़ते हुए नदी के किनारे आ गये थे। उनमें दामाजी पाटील भी थे। जो लड़के घायल हो गये थे, उनमें से भी कुछ बड़े उत्साह से लँगड़ाते हुए पीछे-पीछे दौड़ते आ गये थे। दगामस्ती मौज मजा करने के बाद, बादशाह के सैनिक देर से सोये थे। इसलिए उन्हें गहरी नींद आ गयी थी। गाँव वाले दुबके-दुबके नदी का पाट पार किये। दूसरे किनारे पहुँचकर गाँव वालो ने माचिस कांडी जलाई। उसके फुरफुरे प्रकाश में नदी का किनारा प्रकाशित हो गया। शम्भू महाराज के कान, हाथ पैर के टुकड़े जैसे एक-एक अवयव मिलने लगे। गाँव वालों ने अपनी धोतियाँ खोलीं और शम्भूराजा के मांस के टुकड़ों को उनमें इकट्ठा किया। अपना काम कर लेने के बाद सभी ग्रामीण झपाटे से वापस लौटे। वे गाँव की चौपाल पर वापस पहुँच गये। लड़के अपने घरों की ओर भागे। कोई उपले लेकर आया तो कोई लकड़ी लेकर आया। दाहक्रिया की पूरी तैयारी की गयी। किन्तु कठिन प्रश्न यह उपस्थित हुआ कि किसकी जगह में चिता रचाई जाए? दामाजी पाटील तो अपनी सारी जमीन निछावर करने को तैयार था किन्तु उसकी जमीन कोसभर की दूरी पर थी। गाँव के अन्य जमीन मालिक घबरा रहे थे उन्हें भय था कि कल बादशाह के कर्मचारी आकर उनकी गर्दन पकड़े तो? अमीरों का वह पाखंड गोविन्दा से सहन नहीं हुआ। वह आगे बढ़कर अपनी जमीन दिखाते हुए बोला, "आइए, इधर आइए। यह हम महारों की जमीन है। यहीं सम्भाजी :: 773

हमारी ही जमीन में शम्भू महाराज का दाह संस्कार कीजिए। आप अमीर लोग हैं आपको घर चाहिए, जमीन चाहिए। हम महार हैं, हमें आप जैसा ताम-झाम कहाँ लगता है? कल बादशाह का संकट आया तो परिवार लेकर चले जाएँगे।'' "अरे, गोविन्दा का मौसेरा भाई रायप्पा भी शम्भूराजा का सेवक था।'' बीच से कोई बोला। "सिर्फ रायप्पा ही नहीं महाराज, शिवाजी महाराज की पालकी को कहार के रूप में जन्मभर कौन ढोता रहा? हमारी ही जाति के लोग न? और इन शम्भू महाराज की बात क्या कहें? हम महार्रों के लड़कों की थाली में हाथ डालकर साथ खाने वाला यह पहला राजा था भाइयो। हम उन्हें कैसे भूल सकते हैं?'' गोविन्दा की ही जमीन में शीघ्रता से चिता तैयार की गयी। अन्तिम संस्कार शीघ्रता से पूरा करना था। बादशाह के गुंडों के कभी भी आ जाने की आशंका थी। दामाजी पाटील ने गाँव के बाहर युवकों की फौज खड़ी कर दी थी। उन्हें निर्देश दिया गया था कि यदि बादशाह के घुड़सवार किसी ओर से अचानक आयें तो उन्हें गाँव की सीमा के बाहर रोका जाए। ढेलबाँस और पत्थरों के टुकड़ों के साथ खड़े इन युवकों को कहा गया था कि प्राण चले जायें तो भी दाह संस्कार में रुकावट नहीं आनी चाहिए। इसी आदेश के अनुसार गाँव के लड़के सीमा पर पहरा देते खड़े थे। गोरखनाथ बाबा ने चिता पर बेलपत्र और तुलसीपत्र चढ़ाए। शम्भू महाराज की चिता को अग्नि दी गयी। आग धधक कर जलने लगी। आग की लपटें काले अंधेरे में आसमान की ओर उछलने लगीं। इसके साथ ही गाँव वालों ने विलाप करना आरम्भ कर दिया। स्त्रियाँ और बच्चे जोर-जोर से रोने लगे। एक-दूसरे से लिपटकर रोने वालों का विलाप पूरे गाँव में फैल गया। "अरे रायगढ़ के राजेश्वरऽऽ, तू कहाँ से आ गया रेऽऽ, अरे उड़ते पखेरूऽऽ हे शम्भू महाराजऽऽ।'' भोर होने से पहले ही चिता बुझा दी गयी। महाराज की गर्म राख लेकर पुनः सारा गाँव भीमा नदी के किनारे की ओर दौड़ा। किरणों के फूटने से पहले वह राख नदी को अर्पित कर दी गयी। अब उजाला होने लगा था। पखेरू जाग गये थे। नदी के तट पर एकत्र गाँव के लोग एक-दूसरे को अभिमान से देख रहे थे। एक महान कार्य के सम्पन्न कर पाने का सन्तोष उनके चेहरों पर विद्यमान था। वरिष्ठ स्त्रियों के मुख पर वीरता की श्री झलक रही थी। 774 :: सम्भाजी

भीमा की धारा की ओर देखते हुए गोरखनाथ बाबा ने हाथ जोड़ लिए। श्रद्धाभाव से उन्होंने धारा की वन्दना की। बाबा के आसपास गाँव के लोगों की भीड़ जमा हो गयी थी। बाबा गदगद स्वर में बोले- “गाँववालों यह बात सच है। तुम्हारे पूर्वजों के महान पुण्यों के कारण ही शिवाजी महाराज का यह पराक्रमी बेटा चिरनिद्रा में लीन होने के लिए, तुम्हारे गाँव की मिट्टी की गोद में आया। उधर उस इन्द्रायणी को देखिए। कुछ वर्ष पहले कुछ दुष्ट समाज कंटकों ने तुकोबा माउली की अभंग गाथा को उसकी धारा में डुबो दिया था। कहते हैं कि स्वयं माता इन्द्रायणी ने उसे पानी के बाहर निकाल दिया। उसी प्रकार काल के भीतर समायी हमारे शिवपुत्र की पराक्रम गाथा को ऊपर आने में कितने वर्ष लगेंगे, किसी को भी ज्ञात नहीं। किन्तु आज, कल, परसों, नरसों या कुछ शतकों के बाद ही क्यों न हो, वह ऊपर आएगी अवश्य। क्योंकि सत्य से अधिक शाश्वत चीज संसार में दूसरी नहीं है। जब कभी भ्रम और अफवाहों के पर्दे फाड़कर वास्तविकता समाज के सामने अपने सही रूप में आएगी तब देहू और आलेंदी की तरह इस बढ़ गाँव में भी मेले लगेंगे। देश के लिए, धर्म के लिए, मिट्टी के लिए और स्वाभिमान के लिए मृत्यु को गले लगाने वाले इस वीर पुरुष की समाधि के दर्शन करने के लिए, इस शक्ति-स्थल की ओर दुनिया दौड़ेगी।” सम्भाजी . 775

सम्भाजी : यथार्थ और अयथार्थ

  1. सम्भाजी के व्यक्तिचित्र को धूमिल, अवास्तविक और विकृत बनाने का आरम्भ मल्हार रामराव चिटणीस ने किया। ये बालाजी आवजी के वंशज थे। उन्होंने यह विवरण सम्भाजी महाराज की मृत्यु के एक सौ पचीस वर्ष बाद लिखा। उनके पूर्वज बालाजी आवजी और उनके पुत्र आवजी को हाथी के पैर के नीचे कुचलवाकर मार दिया गया था। इसका दुख मल्हारराव के मन में पहले से ही था। यह इतिहास लेखन वस्तुतः उसी प्रतिशोध का परिणाम था।
  2. मल्हारराव ने अपना अधिकाधिक असन्तोष कवि कलश को लेकर व्यक्त किया है उनके अनुसार उस अघोरी कापालिक के कारण ही राजा और राज्य के लिए खतरा पैदा हुआ। यही उनका प्रमुख अनुमान है। परन्तु सम्भाजी राजा, औरंगजेब जैसे प्रबल शत्रु और उसकी बलशाली सेना के साथ आठ वर्षों तक किस तरह जूझते रहे, यह उनके ध्यान में नहीं आया। विशेष रूप से सम्भाजी के दक्षिण कर्नाटक पर किये गये दो आक्रमण, बुरहानपुर पर उनका दबाव, कुशल अंग्रेजों पर उनके प्रभाव, अरबों के साथ मैत्री, बसई से लेकर पणजी तक पश्चिमी तट के प्रत्येक बन्दरगाह पर पुर्तगालियों के साथ संघर्ष, का कोई विवरण मल्हारराव के पास नहीं है। उन्हें बस एक सत्य मालूम है कि सम्भाजी ने अपने वरिष्ठ कर्मचारियों और सगे सम्बन्धियों को कैद किया था। विशेष रूप से 1685 के पश्चात् महाराष्ट्र के भयानक अकाल और उसके दुखद परिणाम, उसी प्रकार गोलकुंडा और बीजापुर के शासकों को मिलाकर औरंगजेब के आक्रमण के विरुद्ध सम्भाजी द्वारा छेड़ा गया अभियान और महासंग्राम की तैयारी की ओर इस इतिहास में कोई ध्यान नहीं दिया गया।
  3. मराठों का विश्वसनीय इतिहास लिखने में रियासतकार सरदेसाई ने अद्वितीय कार्य किया। ग्रांट डफ के बाद उन्होंने ही मराठों के क्रमवार इतिहास लेखन का कार्य सम्पन्न किया। इतिहास के कोनों में अलक्षित तथ्यों को उन्होंने स्पष्ट रूप से आलोकित किया। 1832 में 'हितचिन्तक' मासिक पत्रिका में आपने 776 . सम्भाजी

'भाऊसाहब पेशवा के जीवनवृत्त की रेखाएँ' शीर्षक से एक आलेख लिखा था। 'पानीपत' उपन्यास लिखते समय भाऊसाहब के अभिनव चरित्र चित्रण में मैंने उस लेख का सुन्दर उपयोग किया था। किन्तु रियासती में सम्भाजी के समय का इतिहास लिखते समय सरदेसाई के भीतर का अनुशासित, सजग और नीर-क्षीर विवेकी इतिहासकार दिखाई नहीं पड़ता। मल्हारराव द्वारा किये गये मिथ्या और द्वेषपूर्ण चित्रण से सम्भाजी के चरित्र पर धूल की इतनी मोटी पर्त जम गयी है कि उसे हटा पाना परिश्रम का कार्य है। इसलिए सरदेसाई ने भी लगभग मल्हारराव की कार्बन कापी ही तैयार की। 'रियासत' में अनेक असत्य और विकृत विधान भरे पड़े हैं। शिवाजी महाराज ने कभी भी पन्हालगढ़ पर सम्भाजी को कैद अथवा नजरबन्द नहीं किया था। ऐतिहासिक दस्तावेजों से यह प्रमाणित है। दिलेरखान के पास जाते समय उनकी पत्नी दुर्गादेवी साथ थीं न कि येसूबाई, परन्तु रियासतकार येसूबाई को वहाँ भेज देते हैं और बड़ी नाटकीयता से उन्हें पुरुषवेष में तैयार करके उन्हें मुक्त भी करा देते हैं। अपनी रियासत के पहले खंड 'शककर्ता शिवाजी' के पृष्ठ क्रमांक 344 पर (सद्यःप्रकाशित पापुलर प्रकाशन का संस्करण देखें) रियासतकार लिखते हैं कि 'सोयराबाई सम्भाजी द्वारा मारी गयीं।' इसके विपरीत इस बात के असंख्य प्रमाण तब भी थे और आज भी हैं कि सम्भाजी के सिंहासनारोहण के वर्ष डेढ़ वर्ष बाद तक सोयराबाई जीवित रहीं। 4 सम्भाजी के सम्बन्ध में अत्यधिक मात्रा में पुर्तगाली दस्तावेज मूल रूप में उपलब्ध हैं। कवि कलश और उनके बीच हुए पत्राचार और अँग्रेजों के साथ हुई सन्धि के मूल दस्तावेज उपलब्ध हैं। आज भी वाराणसी की काशी नागरी प्रचारिणी सभा में सम्भाजी के संस्कृत काव्य महाकाव्य, ब्रजभाषा काव्य सम्बन्धी जानकारी सुरक्षित है। दुर्दैव से किसी अध्येता ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। इसके विपरीत अध्येताओं में इस बात की होड़ लगी रही कि वे किस प्रकार सिद्ध कर सकें कि शिवाजी महाराज जैसे युगपुरुष का बेटा कितना मद्यपी, विषयासक्त, उद्धत और अशिष्ट था। औरंगजेब ने ऐसी प्रतिज्ञा की थी कि काफिर का बच्चा सम्भा जब तक हाथ नहीं लगता, तब तक मैं मुकुट नहीं पहनूँगा। इसके अनुसार अपने नंगे सिर, हिन्दुस्तान का शहंशाह सम्भाजी की खोज में जंगल-जंगल भटकता रहा। इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध होने पर भी हमारे नाटककारों को उसमें कोई नाट्यतत्त्व दिखाई नहीं पड़ा। इसके विपरीत विषयी, क्रोधी और दुष्ट राजकुमार उन्हें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ड्रामेटिक डिवाइस दिखाई पड़ी। इतिहासकारों ने भी उसी सम्भाजी 777

का समर्थन किया। यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है। कुडालकर बाकरे शास्त्री संस्कृत दानपत्र में, जो आज भी उपलब्ध है, सम्भाजी का वर्णन करते हुए बताते हैं कि वे भावुक मन के राजकुमार और स्फटिक से भी निर्मल थे। रियासती का 'उग्र प्रकृति सम्भाजी' खंड शीर्षक के साथ ही मिथ्या विधानों से भरा पड़ा है। 5 यह सब विस्तार से लिखने का कारण यह है कि मल्हारराव की बड़ी भूलों को रियासतकार ने ज्यों का त्यों ग्रहण कर लिया। नाटककारों ने 'रियासती' को श्रेष्ठ ऐतिहासिक कृति के रूप में देखा। सम्भाजी मराठी नाटकों के लिए एक अन्यतम विषय सिद्ध हुआ। मराठी में इस एक विषय पर सत्रह से भी अधिक नाटक लिखे गये हैं। नाटककारों को प्रतिभा के अनेक विलक्षण पंख फूटे हैं। रायगढ़ पर गंगासागर नामक तालाब में उन्होंने कल्पना की नाव छोड़ी। उसी नाव में बैठकर येसूबाई नौकाविहार करती हैं। नाव से उतरकर वे झटपट रंगमंच पर प्रवेश करती हैं। मंच पर उनका प्रवेश अपने चरित्रभ्रष्ट पति की आलोचना के लिए ही होता है। कवि कलश के परिचय के लिए जब मंच पर पर्दा उठता है तो उन्हें भैंसे की खाल पर अनुष्ठान करते हुए बिठाया जाता है। भैंसे की गीली या सूखी खाल कितनी सख्त और मोटी होती है? उसे बिछाने के लिए कितने लोग लगेंगे? इस पर बैठने वाला व्यक्ति कितना विचित्र लगेगा? एक पुराने रंगकर्मी ने मुझे बताया कि कवि कलश के मंच पर प्रवेश के लिए हम भैंसे की खाल की जगह बकरे की खाल बिछाते थे। 6 प्रा नरहर कुरुंदकर 'श्रीमान योगी' की प्रस्तावना में लिखते हैं, "सम्भाजी ने पुर्तगालियों के तीन-चौथाई राज्य को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। कर्नाटक का राज्य दुगुना हो गया, सेना पहले से दुगुनी हो गयी। शिवाजी की राजनीति का विकास सम्भाजी में दिखाई पड़ता है।" कुरुंदकर ने सन् 1960 में एक विस्तृत लेख लिखकर सम्भाजी के चरित्र पर उज्ज्वल प्रकाश डाला था। अरबी और फारसी दस्तावेजों के आधार पर सेतु माधव पगड़ी जैसे वरिष्ठ अध्येता सम्भाजी के सम्बन्ध में जीवनभर बड़े आदर और गौरव से लिखते और बोलते रहे। शिवपुत्र सम्भाजी ने हिन्दुस्तान के पुर्तगाली शासकों को किस तरह हैरान किया? इसका प्रमाण उन पत्रों में उपलब्ध है जो पुर्तगाली वाइसराय कांट दी आल्होर ने अपने पुर्तगाल के राजा को लिखे थे। किन्तु इन सभी बातों की पूर्णतः उपेक्षा की गयी। प्रा कुरुंदकर ने अपने अध्ययन के अन्त में स्पष्ट किया है कि, "सम्भाजी की भ्रष्टता का आरोप 1690 के बाद आरम्भ हुआ। श्री पगड़ी का भी यही मत है। इसका अर्थ यह है कि सम्भाजी के कठोर अनुशासन से जिन्हें कष्ट पहुँचा था अथवा जागीर न बाँटने की शिवाजी महाराज की नीति का सम्भाजी ने जिस कठोरता से 778 :. सम्भाजी