छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै। हमारी एक भी बात तूने नहीं मानी। कम से कम एक बार शरणागत होने की बात तू कहे, इसीलिए ही तेरी जुबान हमने सलामत रखी है। किन्तु तुमने अपनी जुबान का इस्तेमाल नहीं किया। वर्षों से मेरे साथ विश्वासघात करने वाले गद्दारों का नाम बताने के लिए भी तू तैयार नहीं है। तुम्हारी आँखों के कोटर से गोलक को निकाले आज सात दिन हो गये। तुम्हें अँधेरे के समुद्र में ढकेल दिया, फिर भी तुम्हारे अभिमानी पैर काँपे नहीं, मौत के दरवाजे पर तेरा पशुओं जैसा जुलूस निकाला गया फिर भी रायगढ़ पर तुम्हारी रानी जरा भी नहीं घबराई। किलों की चाभियाँ लेकर वह तुम्हारी जिन्दगी भी माँगने मेरे पास नहीं आयी। सह्याद्रि के पहाड़ों की भाँति तुम दोनों को कितना अभिमान है। सम्भा इसके बाद भी तुम्हें जीवित रखा जाए, इसकी कोई वजह तो नहीं बची है।" मृत्यु की दहलीज पर वह महायोगी, बिना रंचमात्र भी विचलित हुए खड़ा था। कमाल की ठसक, न हाँ न हूँ। जीवन-मरण की कल्पना से वह योजनों ऊँचे उठ चुका था। बादशाह की फौज, उसका कैदखाना, उसकी राक्षसी कुटिलताएँ आदि उसे नगण्य लग रहे थे। उसके भीतर केवल जगदम्बा, जगदीश्वर और शिवाजी महाराज की स्मृतियों का आवर्तन हो रहा था। बादशाह बड़ी दृढ़ता से कदम बढ़ाता हुआ उस तेज पुंज योद्धा के पास आकर बुदबुदाया, "सम्भा, काफिर बच्चे, मैंने पिछले आठ वर्षों में जंग ए मैदान में तुम्हारे जलवों को देखा है। उन्हें दाद देने के लिए, तुम्हारे सारे गुनाहों को माफ करके, तुम्हें राजबन्दी बनाकर उम्रकैद में रखने की इच्छा मेरे जैसे बादशाह के मन में हुई तो इसमें बुराई क्या है? इसलिए एक आखिरी मौका ले लो। हमें बता दो कि तुम्हारे हीरे-जवाहरात से भरे खजाने कहाँ हैं? यह भी बता दो कि वे गद्दार कौन हैं जो जिन्दगीभर बादशाह का नमक खाकर भी दुश्मनों का गुणगान करते रहे।" बादशाह की इस कुटिल चाल का कोई उपयोग नहीं हुआ। वह सीधी गर्दन और पीठ बादशाह के सामने जरा भी नहीं झुकी। औरंगजेब अपनी विफलता से आहत, पीड़ा भरी हँसी हँसते हुए बोला, "सम्भा, यह तो खुदा की ही मेहरबानी है कि तू धोखे से एक दक्खिनी सरदार के हाथ लग गया। नहीं तो जंगली पंछी और बहती हवा को कौन पकड़ पाता है? इससे आगे तुम्हें जीवित रखने का गुनाह हम कतई नहीं करेंगे। क्योंकि यदि इस बार मैंने तुम्हें जिन्दा छोड़ दिया तो हमें पूरा यकीन है कि तू मेरा ही खात्मा कर देगा। इस बात को तुम भी जानते हो और मैं भी अच्छी तरह जानता हूँ।" अधिक विलम्ब न करके बादशाह ने जल्लादों की ओर घूरकर देखा। उनके हाथों में धारदार तलवारें और कुल्हाड़ियाँ थीं। तलवारें और कुल्हाड़ियाँ मशालों की रोशनी में चमक रही थीं। पास ही भीमा नदी की अँधेरे में डूबी धारा थी। इस सम्भाजी 703