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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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लिया था। जहाँ-जहाँ और जब-जब अवसर मिलता था; औरंगजेब यही बताने का प्रयत्न करता था कि कवि कलश और सम्भाजी राजा मामूली कैदी हैं। वह अट्टहास करते हुए कहता था कि इनकी औकात फाँसी के तख्ते पर ले जाने की नहीं है। इसी का परिणाम था कि कविराज के शरीर के टुकड़े भीमा नदी के किनारे फेंक दिये गये थे। यह खबर फैल गयी कि सम्भाजी को मृत्युदंड बादशाह के सामने दिया जाना था। इसी के लिए बादशाह निकल चुका था। इसकी खबर मिलते ही असदखान ने खेमे के दरवाजे पर ही उन्हें रोक लिया। असदखान ने कहा, "जहाँपनाह, आप बार-बार कहते हैं कि सम्भा एक मामूली कैदी है उसकी ऐसी क्या औकात कि उसकी सजा अमल में लाते समय स्वयं किबलाए आलम वहाँ उपस्थित हों ?" बादशाह ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। वह रुका भी नहीं। उसकी सवारी तीव्रगति से नदी की ओर चल पड़ी। बादशाह नदी के किनारे पहुँच गया। भीमा नदी में सूर्य का बिम्ब छुपने लगा था। आसपास के तम्बुओं, डेरों, घरों के नेत्र उग आये थे। सभी की दृष्टि नदी के किनारे की ओर लगी थी। वृक्षों की डालियों में पंछी मौन हो गये थे। दो टिटहिरियाँ टीं-टीं करती हुई नदी के पाट वेग से पार करती हुई चली गयीं। बेड़ियों से जकड़े शम्भू महाराज नदी की ढाल पर खड़े थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उनकी आँखों के कोटरों से कुछ मोम जैसा द्रव बह रहा था। डेढ़ महीने के बढ़े हुए दाढ़ी के बाल कड़े होकर ऐंठ गये थे। वे योगी की मुद्रा में खड़े थे। सभी गतिविधियों में हर्ष और उन्माद का भाव दिख रहा था। इतने संकटों के बाद भी और तूफानी हवा के झोंकों में मौत की दहशत सामने होने पर भी सम्भाजी राजा गर्दन और पीठ सीधी करके खड़े थे। “चलोऽऽ बेवकूफ़ो हटो, कैदी के तो आँख ही नहीं है, उसे टोपी क्यों पहना रहे हो ?" इसके साथ ही टोपी दूर फेंक दी गयी। औरंगजेब स्वयं जाकर उस खम्भे के पास खड़ा हो गया। उसने जल्लादों को दूर हटने का इशारा किया। खम्भे से जकड़े हुए उस देह को औरंगजेब किसी उन्मादी की तरह देख रहा था। इसी नर शरीर ने पाँच वर्षों तक औरंगजेब के सिर से ताज को खिसका दिया था। इसी ने औरंगजेब को दुख, अपमान और विफलता का बोध देकर दक्खिन की खाक छनवाई थी। वही हठी विद्रोही देह आज औरंगजेब की मुट्ठी में आ गयी थी। इसका वह हार्दिक समाधान और सन्तोष अनुभव कर रहा था। खम्भे के साथ, जंजीरों से जकड़े सम्भाजी राजा की ओर देखते हुए औरंगजेब ने कहा, "जहन्नमी सम्भाऽऽ, तूने अपने बाप की अपेक्षा हमें दस गुना ज्यादा परेशान किया है, सताया 762 :: सम्भाजी