छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 763, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंआवाज इतनी तेज और धारदार थी कि यमदूतों के पैर लड़खड़ा गये। वे यन्त्रवत कवि कलश को लेकर सम्भाजी राजा के सामने आ गये। दोनों की साँसों को एक दूसरे की आत्मीय पहचान थी। सम्भाजी राजा ने 'कविराजऽऽ' कहकर दहाड़ मारी। दोनों के शरीर एक दूसरे की ओर खिंचते गये। दोनों के ही हाथ पीठ पर बँधे थे। एक दूसरे के गले मिलने की दोनों की प्रबल आकांक्षा थी, किन्तु यह सम्भव नहीं था। चकमक पत्थर पर पत्थर रगड़ने से जिस प्रकार चिनगारियाँ निकलतीं उसी तरह दोनों के शरीर परस्पर सम्बन्ध स्थापित कर रहे थे। उनकी करुण श्वासों और हुंकारों ने एक विचित्र वातावरण निर्मित कर दिया था। जीभ के अभाव में कविराज बोल नहीं पा रहे थे। उन दोनों की छटपटाहट विलक्षण थी। पंखकटा जटायु भी इतना न तिलमिलाया होगा। शम्भूराजा ने रोते हुए पूछा, "कविराज, चल पड़े आप मृत्यु के महामन्दिर की ओर? मुझसे भी पहले? कितने भाग्यवान हैं आप?" कविराज की देह तमतमा गयी। औरंगजेब की दुष्ट कटार से जीभ काट दी गयी थी। किन्तु उनकी तनी नसें, खुले हुए रन्ध्र, शरीर पर खड़े रोम रोम अर्थात् पूरा शरीर बोलने लगा। श्वासों में स्वर फूटे, "हाँ राजन, मैं सचमुच भाग्यवान हूँ। इसीलिए तो आपसे पहले दौड़ पड़ा हूँ उस स्वर्ग मन्दिर की ओर। ईश्वर के दरबार से फूलों की डलियाँ लूटकर ले आऊँगा और सारे फूल आपके रास्ते में बिछा दूँगा। इतने दिनों के घोर परिश्रम के कारण आपके पैर आहत और श्रान्त हो गये हैं। इतनी सुविधा ही उन्हें दे सकूँ तो धन्य हो जाऊँगा।" यह क्षणिक स्पर्श भी अधिक देर तक सम्भव न था। उन यमदूतों ने कविराज को खींचकर अलग कर दिया। कविराज को खींचते घसीटते नदी के किनारे ले गये। औरंगजेब के जल्लादों ने दोपहर को ही सारी तैयारी पूरी कर ली थी। कविराज के हाथ पैर आदि प्रत्येक अवयव काट दिए गये। उनके अवयव एवं रक्त मांस को नदी के किनारे बिखेर दिया गया। पन्द्रह कोस की परिधि में पसरे बादशाह के शिविर में सन्नाटा छाया हुआ था। कविराज की इस अमानवीय हत्या की खबर चारों ओर फैल गयी। फौजी खेमे ने अनुभव किया कि कवि कलश पर होने वाला यह नृशंस अत्याचार, सम्भाजी राजा पर होने वाले अत्याचार का पूर्वाभ्यास था। बादशाह की फौज में काम करने वाले गरीब भिश्ती, जो मराठी थे, छिप छिप कर रो रहे थे। शिवाजी महाराज के केवल दस वर्ष बाद उनके पुत्र, महाराष्ट्र के दूसरे छत्रपति का इस प्रकार पीड़ित किया जाना उन्हें डरा रहा था। बादशाही खेमे में मृत्युदंड देने के लिए अलग एक तख्ता बनाया गया था। किन्तु कविराज और सम्भाजी राजा को वहाँ न ले जाने का निर्णय स्वयं औरंगजेब ने
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