छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरहा। उस आनन्द के प्रवाह में हम डूब गये थे। उस भेंट से शरीर इतना पावन हो गया कि मृत्यु का कोई भय नहीं रहा। अब जब चाहें वे यमदूत आ जाएँ।'' कविराज आगे सरके। राजा का खुरदुरा और थका हुआ हाथ अपने गालों के पास रखा। उनका मन भर आया। उस राक्षसी बन्दीखाने में पाशविक बेड़ियाँ भी हँसने लगीं। सम्भाजी राजा कहने लगे, "मृत्यु एक हठी मेहमान है। धक्का देकर हटाएँ तो भी दरवाजे पर पालथी मारकर बैठ जाने वाली। किन्तु अब वह कभी भी आ जाये चिन्ता नहीं है। वह जीभ लपलपाती आये, वज्रयात बनकर आये, ज्वालामुखी का लावा बनकर आये या राज्यप्रासाद का खम्भा बनकर गिरे, कोई चिन्ता नहीं है। अब इस शरीर को मृत्यु का भय रहा ही नहीं।।" बोलते-बोलते सम्भाजी राजा की नाक से गर्म श्वास निकलने लगी। उन्होंने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। वे बेचैन होकर कहने लगे, "एक ही बात की तीव्र इच्छा थी जो अधूरी रह गयी। उस पापी औरंगजेब का सिर काटकर, चितदरवाजे की देहरी के नीचे एक बार गाड़ दिया होता तो निश्चिन्त मन से हँसते-हँसते स्वर्ग की सीढ़ियाँ चढ़ा होता। इसी बात का दुख हो रहा है। जिन हाथों सुदूर कावेरी की धारा में घोड़ा कुदाया, त्रिचनापल्ली के गर्वीले पाषाणकोट की तटबन्दी में सुरंग लगाई, जिसके भय से पुर्तगालियों के वाइसराय को नाव में बैठकर जान बचाकर भागना पड़ा, जिसने सिद्दियों की पूँछ तोड़कर जंजीरे की बिल में घुसाकर रखा, औरंगजेब की पाँच लाख की फौज देहाती कुत्तों की तरह दूर-दूर से गुर्राती रही किन्तु सह्याद्रि में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं हुई। किसी दूसरे किले पर भी मुगल अधिकार न जमा सके, उसी सम्भाजी की पीठ में अपने लोगों ने ही बगावत की विषैली कटार भोंक दी। खैर, इस सम्भाजी ने जिन्दगी में कभी भी मृत्यु की चिन्ता नहीं की। मृत्यु को मैंने अनेक बार धक्का दिया है। हुआ यह कि अनेक बार मृत्यु स्वयं डरकर भाग गयी। युद्धभूमि में मृत्यु मिल गयी होती तो उसे बाँहों में भर लेता। उस रूप में जलकर खाक होते हुए सात जन्मों की कृतार्थता का अनुभव करता। किन्तु आज इस प्रकार चोर उचक्के की तरह दबे पाँव आ रही है, इसका दुख हो रहा है।" दोपहर में अचानक वाहनों की घड़घड़ाहट सुनाई पड़ने लगी। उनकी अस्पष्ट फुसफुसाहट और तीव्रगति से होने वाली हलचल से सम्भाजी राजा ने जान लिया कि वे मृत्यु दूत थे। सम्भाजी राजा सावधान हो गये। पर वे भयानक कदम दूसरी ओर ही रुक गये। कवि कलश के साथ कुछ हाथापायी सुनाई दी। ऐसा लगा कि उन शैतान यमदूतों ने कविराज को जकड़ लिया है। पदचाप दूर जाती सुनाई दी। आँखों में दृष्टि नहीं थी। किन्तु राजा के रोम-रोम अपने आत्मीय मित्र के लिए क्रन्दन कर रहे थे। सम्भाजी राजा ने कठोर स्वर में पुकारा, "ठहरोऽऽ इधर आओऽऽ।" यह 760 सम्भाजी