छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहमारी ही जमीन में शम्भू महाराज का दाह संस्कार कीजिए। आप अमीर लोग हैं आपको घर चाहिए, जमीन चाहिए। हम महार हैं, हमें आप जैसा ताम-झाम कहाँ लगता है? कल बादशाह का संकट आया तो परिवार लेकर चले जाएँगे।'' "अरे, गोविन्दा का मौसेरा भाई रायप्पा भी शम्भूराजा का सेवक था।'' बीच से कोई बोला। "सिर्फ रायप्पा ही नहीं महाराज, शिवाजी महाराज की पालकी को कहार के रूप में जन्मभर कौन ढोता रहा? हमारी ही जाति के लोग न? और इन शम्भू महाराज की बात क्या कहें? हम महार्रों के लड़कों की थाली में हाथ डालकर साथ खाने वाला यह पहला राजा था भाइयो। हम उन्हें कैसे भूल सकते हैं?'' गोविन्दा की ही जमीन में शीघ्रता से चिता तैयार की गयी। अन्तिम संस्कार शीघ्रता से पूरा करना था। बादशाह के गुंडों के कभी भी आ जाने की आशंका थी। दामाजी पाटील ने गाँव के बाहर युवकों की फौज खड़ी कर दी थी। उन्हें निर्देश दिया गया था कि यदि बादशाह के घुड़सवार किसी ओर से अचानक आयें तो उन्हें गाँव की सीमा के बाहर रोका जाए। ढेलबाँस और पत्थरों के टुकड़ों के साथ खड़े इन युवकों को कहा गया था कि प्राण चले जायें तो भी दाह संस्कार में रुकावट नहीं आनी चाहिए। इसी आदेश के अनुसार गाँव के लड़के सीमा पर पहरा देते खड़े थे। गोरखनाथ बाबा ने चिता पर बेलपत्र और तुलसीपत्र चढ़ाए। शम्भू महाराज की चिता को अग्नि दी गयी। आग धधक कर जलने लगी। आग की लपटें काले अंधेरे में आसमान की ओर उछलने लगीं। इसके साथ ही गाँव वालों ने विलाप करना आरम्भ कर दिया। स्त्रियाँ और बच्चे जोर-जोर से रोने लगे। एक-दूसरे से लिपटकर रोने वालों का विलाप पूरे गाँव में फैल गया। "अरे रायगढ़ के राजेश्वरऽऽ, तू कहाँ से आ गया रेऽऽ, अरे उड़ते पखेरूऽऽ हे शम्भू महाराजऽऽ।'' भोर होने से पहले ही चिता बुझा दी गयी। महाराज की गर्म राख लेकर पुनः सारा गाँव भीमा नदी के किनारे की ओर दौड़ा। किरणों के फूटने से पहले वह राख नदी को अर्पित कर दी गयी। अब उजाला होने लगा था। पखेरू जाग गये थे। नदी के तट पर एकत्र गाँव के लोग एक-दूसरे को अभिमान से देख रहे थे। एक महान कार्य के सम्पन्न कर पाने का सन्तोष उनके चेहरों पर विद्यमान था। वरिष्ठ स्त्रियों के मुख पर वीरता की श्री झलक रही थी। 774 :: सम्भाजी