छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पालन किया था, उससे महाराष्ट्र के बहुत से जागीरदार और जमींदार दुखी हो गये थे। उन्होंने सम्भाजी की मृत्यु के पश्चात ही बड़े पैमाने पर सम्भाजी की बदनामी करनी आरम्भ की। 7. शिवाजी महाराज के अष्टप्रधानों में और प्रमुख कर्मचारियों में दुर्भाग्य से अनेक आगे चलकर विश्वसनीय नहीं रहे। बालाजी आवजी और मोरोपन्त जैसे वरिष्ठ एवं सम्मानित व्यक्ति इसमें सम्मीलित थे। राजनीति में कुशल अण्णाजी दत्तो और उनके द्वारा स्थान-स्थान पर नियुक्त स्वार्थी कर्मचारियो द्वारा भ्रष्टाचार और अविश्वसनीयता का वातावरण बढ़ रहा था। वय से तरुण और हृदय मे पवित्र सम्भाजी ने उनके विरोध में आवाज उठाई। इससे प्रभावित अधिकारियों ने शिवाजी महाराज से शिकायत की। इसलिए ऐन मौके पर शिवाजी महाराज ने कर्नाटक युद्ध में उन्हें साथ ले जाने से मना कर दिया। यहीं से सम्भाजी और अधिकारियों के बीच संघर्ष आरम्भ हुआ। पीढ़ियों के बीच का अन्तर भी इसमें कारणीभूत था। शिवाजी के पुत्र और दूसरे छत्रपति बने सम्भाजी के भोजन में विष मिलाकर उन्हें मारने का प्रयास इन अधिकारियों ने अनेक बार किया। इस राजद्रोह और विश्वासघात को बार-बार क्षमा करने पर भी इसकी पुनरावृत्ति होती रही। उन लोगों ने अपने राजा को समाप्त कर देने का प्रयास बार बार किया। इसीलिए अन्त मे इन कर्मचारियों को राजदंड देने के कर्तव्य का निर्वाह सम्भाजी को करना पडा। इन्हीं कर्मचारियों के वंशजों ने बाद में सम्भाजी के चरित्र का हनन किया। पानीपत के युद्ध के समय भाऊसाहब का साथ छोड़कर जो लोग महाराष्ट्र भाग आये थे उन्होंने अपने सम्मान की रक्षा के लिए पानीपत का जो झूठा इतिहास रचा उसमें और जानबूझकर सम्भाजी की की गयी बदनामी में एक ही मनोवृत्ति काम कर रही थी। 8 औरंगजेब के महाआक्रमण का मुँह मोड़ने के लिए सम्भाजी ने हर सम्भव प्रयत्न किया था। कुतुबशाह और आदिलशाह ही नहीं, इक्केरी के बासप्पा नाईक तक दक्षिण के अनेक राजाओं का एक संघ सम्भाजी ने तैयार किया था। परन्तु कुतुबशाह विलासी वृत्ति का और आदिलशाह उम्र में कम और अनुभव में शून्य था। फिर भी दक्षिण की रक्षा करने में सम्भाजी राजा, हंबीरराव मोहिते, निलोपन्त पेशवा, खंडो बल्लाल केसो त्रिमल पिंगले आदि की भूमिका उल्लेखनीय है। औरंगजेब के सेना समुद्र से यदि सम्भाजी आठ वर्षों तक लगातार न लड़ते, दो-चार महीने में ही हथियार डाल दिया होता तो आज का महाराष्ट्र कहाँ होता ? 9 कवि कलश के सम्बन्ध में नाटककारों ने एक कपटी, पाखंडी और धूर्त व्यक्ति का चित्र प्रस्तुत किया है किन्तु कविराज की उपलब्ध काव्य-पंक्तियाँ उन्हें एक ईमानदार और राजनिष्ठ व्यक्ति प्रमाणित करती हैं। एक ओर जहाँ शिवाजी महाराज के सभी जामाता औरंगजेब के साथ जाकर मिल गये थे वहीं यह कनौजी सम्भाजी :: 779
ब्राह्मण, सम्भाजी का साथ मृत्यु की सीढ़ियों तक निभाता रहा। विशेष रूप से 1685 के बाद जब महाराष्ट्र के अनेक मराठा और ब्राह्मण जागीरदार जागीर प्राप्त करने के लिए औरंगजेब के कदम चूम रहे थे, ऐसे समय में कवि कलश ने पत्र लिखा था, "राजद्रोह नहीं करूँगा। सम्भाजी महाराज का साथ नहीं छोड़ूँगा।" ऐसे अनेक मूल पत्र उस समय के कागज पत्रों में उपलब्ध हैं। पेशवा कार्यालय में कवि कलश का ऐसा पत्र भी सुरक्षित है जिसमें उन्होंने लिखा था कि अत्याचार के कारण धर्मान्तर करने वाले हरसूल के कुलकर्णी को पुनः हिन्दू धर्म में सम्मिलित किया जाए, उनका शुद्धीकरण किया जाए। इन कागज पत्रों और प्रमाणों पर यदि गम्भीरता से विचार किया जाये तो नाटककारों और इतिहासकारों के आक्षेप अपने आप निर्मूल हो जाते हैं। 10. 'बुसातीन उस्-सलातिन' नामक ग्रन्थ में उल्लेख है कि सम्भाजी का एक ब्राह्मण कन्या के साथ प्रेम था। वे उससे मिलने के लिए रात को किले से बाहर जाते थे। यह कन्या थी अण्णाजी दत्तो की बेटी, ऐसा भी कुछ लोग मानते हैं। 'द मिलिट्री सिस्टम ऑफ मराठाज़' जैसा शोधपरक और उच्चकोटि का ग्रन्थ लिखते हुए डॉ सेन ने कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण बातों का उल्लेख किया है। उनके अनुसार उस समय प्रत्येक किले के किलेदार सन्ध्या समय किले के दरवाजों को अपने से भीतर से ताला लगाते थे। दूसरे दिन वह स्वयं चाबी लेकर जाते थे और उनके सामने दरवाजा खोला जाता था। स्वयं शिवाजी महाराज के किले पर रहते हुए ऐसी परिस्थिति में आधी रात सम्भाजी का घूमना सर्वथा असम्भव कल्पना है। गोदावरी की एक लोककथा है। श्री द. ग. गोडसे ने उसे बड़े प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। किसी सुन्दर और शौर्यवान पुरुष से अनेक स्त्रियाँ एकतरफा प्रेम कर सकती हैं। परन्तु इसका अर्थ उस पुरुष का स्त्रीलम्पट अथवा चरित्रहीन होना नहीं होता। 11. जिस समय सम्भाजी संगमेश्वर में पकड़े गये उस समय असावधान थे क्या? अथवा उस समय विनोद विलास में डूबे होने के कारण पकड़े गये? इतिहासकारों ने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया है कि इस प्रवास के समय राजा के साथ कौन-कौन थे। रायगढ़ का स्थानीय कार्यभार सँभालने वाली महारानी येसूबाई, हिन्दवी स्वराज्य के सेनापति म्हालोजी घौड़पड़े, रामदास स्वामी के पट्ट शिष्य रंगनाथ स्वामी, धनाजी, सन्ताजी जैसे कुशल और आत्मीय जनों के बीच सम्भाजी भोग विलास में कैसे रम सकते थे? इतिहास साक्षी है कि संगमेश्वर पहुँचने के पहले सम्भाजी ने पास के विशालगढ़ के किले के गिरे हुए बुर्ज को दो तीन दिन में ठीक करवाया था। यदि दूसरा समय होता तो इस कार्य में महीनों लग जाते। उसी समय सुदूर दक्षिण के तमिल प्रान्त में केशव त्रिमल के नेतृत्व में अठारह हजार की सेना लड़ रही थी। आंबा घाट पर सात-आठ हजार की मलकापुरी फौज 780 :: सम्भाजी
तैनात थी। फिर यह राजपुत्र असावधान कैसे था ? शादी-ब्याह के अवसर पर सौ- दो सौ लोगों की अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़े तो कमर टेढ़ी हो जाती है। यह बत्तीस वर्ष का शिवपुत्र प्रचंड अकाल, बादशाह से मिल गये अपने सगे बहनोइयों, धोखेबाज देशद्रोही जागीरदारों से अकेला जूझ रहा था। अपनी साठ-सत्तर हजार की सेना लेकर औरंगजेब की विशाल सेना का मुकाबला करने के लिए शिवपुत्र को कितनी तैयारी करनी पड़ी होगी ? इसकी कल्पना की जा सकती है। 12. सम्भाजी महाराज ने दक्षिण में जो दो अभियान किये, उसकी ओर डॉ. बी. मुद्धाचारी के अतिरिक्त किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। आज भी दक्षिण में सम्भाजी के अभियान की साक्षी देने वाले अनेक शिलालेख तमिल और कन्नड़ भाषा में उपलब्ध हैं। किन्तु उनकी ओर ध्यान देने वाला कोई नहीं है। कुछ महीने पहले मैं अपने एक आई.ए.एस. श्रेणी के अधिकारी आनन्द पाटील (जिलाधिकारी, शिवगंगा, तमिलनाडु) के साथ त्रिचनापल्ली गया था। आज पाषाणकोट वहाँ पर बोधचिह्न के रूप में प्रयुक्त होता है। आज भी पाषाणकोट के पास बैठकर कावेरी के पाट को देखते हुए दिल धड़कने लगता है। एक समय कावेरी नदी में घोड़ा कुदाकर सम्भाजी ने पाषाणकोट को किस तरह जीता ? इसकी कल्पना से शरीर काँप उठता है। जंजीरा के पास सम्भाजी द्वारा बनाए गये सेतु के कुछ पत्थर आज भी उस अतीत का साक्ष्य दे रहे हैं। सम्भाजी के साथ धोखा श्रृंगारपुर के पास मालेघाट की सँकरी राह आज भी उतनी ही भयानक, अन्धकारभरी और रहस्यमय दिखाई पड़ती है। बस के आने जाने के लिए दूसरी ओर अनुस्कुरा घाट को तोड़कर रास्ता बनाया गया है फिर भी अनेक वाहनों के लिए प्राणघातक सिद्ध होता है। उसके समीप से आज भी सम्भाजी के समय की टूटी-फूटी राह विद्यमान है। 'मगनलाल ड्रेस वाला' के किराए के कपड़े पहनकर मद्यपी के रूप में रंगमंच पर नाचने वाला सम्भाजी कोई और है। किन्तु सह्याद्रि की घाटियों को ढाल की तरह उपयोग करने वाला, घोड़े पर अपना सिंहासन लादकर बादशाही फौज से जीवनभर संघर्ष करने वाला, महाराष्ट्र के इतिहास को कल्पान्त तक कायम रखने वाला सम्भाजी बहुत-बहुत अलग है। 13. सम्भाजी का दुखद अन्त बहुत दारुण था। जिस प्रकार नाटककार तीसरे अंक में औरंगजेब और सम्भाजी को आमने-सामने खड़ा करते हैं, वस्तु स्थिति वैसी नहीं है। संगमेश्वर में धोखे से पकड़े जाने के बाद से उनकी तुलापुर की मृत्यु तक की चालीस दिनों की कालावधि अत्यन्त पीड़ादायी है। बादशाह ने दारा जैसे अपने सगे भाई को भी दो-चार दिन की ही कैद दी थी। किन्तु सम्भाजी से उनके सभी सम्भाजी :: 781
महत्त्वपूर्ण किलों का अधिकार औरंगजेब को लेना था। उस कालखंड में महारानी येसूबाई, दुर्गाबाई और सम्भाजी के सभी कुटुम्बियों पर कितने अरिष्ट टूट पड़े थे इसकी केवल कल्पना की जा सकती है। 14. ताराबाई के समय के दस्तावेजों में अर्जोजी यादव का मूल पत्र मौजूद है। उसमें 'मातो श्री दुर्गाबाई से मिलकर आया' ऐसा स्पष्ट उल्लेख है। इससे यह शंका निर्मूल हो जाती है कि दुर्गाबाई सम्भाजी की पत्नी थीं अथवा उपपत्नी। 15. बखरकार और इतिहासकार जिस तरह दिखाते हैं, वैसी औरंगजेब की विवाहयोग्य उस समय कोई लड़की नहीं थी। इसलिए नाटकों के अनुसार सम्भाजी द्वारा उसके हाथ माँगने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसके अतिरिक्त यह कहना कि सम्भाजी जीवन भर विलासी और बदचलन था किन्तु आँखों के आगे मृत्यु को देख धार्मिक बन गया। एक दिन के लिए ही क्यों न हो 'धर्मवीर' बन गया, ठीक नहीं है। जिन्दगीभर व्यसनी और बदचलन व्यक्ति बादशाह के पास जनानखाने की चाभी माँगेगा। क्योंकि उसकी मूलवृत्ति वही है। बाकी की बकवास क्यों करता बैठेगा? कुछ लोग सम्भाजी राजा की मृत्यु के सन्दर्भ में फिल्मी ढंग से हृदय परिवर्तन की बात करते हैं। यह पूर्णतया असत्य है। सत्य तो यह है कि युगपुरुष शिवाजी महाराज के योग्य पुत्र सम्भाजी राजा अपने पिता के पुण्य के प्रति सजग बने रहे। औरंगजेब के विरुद्ध अंबर के राजा रामसिंह को संस्कृत में लिखा गया पत्र आज भी उपलब्ध है। उसमें औरंगजेब जैसे शत्रु को नेस्तनाबूद करने के लिए उत्तर के राजाओं को एक होने का आवाहन किया गया है। सम्भाजी राजा को मराठा नौसेना का महत्त्व अच्छी तरह ज्ञात था। इसीलिए शिवाजी महाराज के बाद उन्होंने एक भी बेड़ा कम नहीं होने दिया। मुम्बई बन्दरगाह का महत्त्व समझने के कारण ही उन्होंने अंग्रेज गवर्नर केजविन से मुम्बई खरीदने का प्रयास किया। अन्त में उन्होंने कराल काल के मुँह में अपना सिर दे दिया किन्तु सह्याद्रि का एक भी महत्त्वपूर्ण किला औरंगजेब के हाथ में नहीं जाने दिया। त्रिचनापल्ली से बुरहानपुर तक उन्होंने अपनी तलवार का चमत्कार दिखाया। जिस उद्देश्य से वे आठ वर्ष तक जूझते रहे, उसी ध्येय से आयु के मात्र बत्तीसवें वर्ष में मृत्यु के सामने गये। 16. इस बृहद उपन्यास के लेखन में मेरे अनेक मित्रों और शुभेच्छुओं ने आत्मीय सहयोग प्रदान किया, उन सभी का मैं हृदय से आभारी हूँ। महान शोधकर्ता डॉ. र.वि. हेरवाडकर की पुत्री सौभाग्यवती शिरीन कुलकर्णी ने हेरवाडकर के संग्रहों में से अनेक ग्रन्थ उपलब्ध कराए। इन ग्रन्थों से मुझे बड़ी सहायता मिली। इसी प्रकार डॉ. सदाशिव शिवदे ने अपने संग्रह से अनेक दस्तावेज उपलब्ध कराए। इसके लिए मैं उनका सदैव ऋणी रहूँगा। आज महाराष्ट्र में सम्भाजी के साहित्य पर 782 :: सम्भाजी
गहराई से शोध करने वाले डॉ. जयसिंह राव पवार और डॉ. सदाशिव शिवदे ख्यात शोधकर्ता हैं। इन दोनों के साथ समय-समय पर होने वाले विचार-विमर्श और उनके द्वारा दिए गये सुझावों का मुझे बहुत लाभ हुआ है। इसके अतिरिक्त पुणे के डेकन कॉलेज की ग्रन्थपाल सौभाग्यवती मोरे, लोकमान्य तिलक ग्रन्थालय, चिपलूण के कार्यवाह, मेरे मित्र प्रकाश देशपाण्डे, सुधागढ़ पाली के श्री सूर्यकान्त ताटे और सुरेश पोतदार का सहयोग भी मेरे लिए मूल्यवान है। पत्रकार श्री मधुकर भावे, और उल्लासदादा पवार ने मुझे इस संकल्प सिद्धि की प्रेरणा निरन्तर दी है। बहादुरगढ़ (तहसील श्रीगोंदा) की यात्रा के समय मेरे मित्र प्रकाश और श्री अरुण जाखड़े ने बहुत समय दिया। शृंगारपुर और संगमेश्वर देखते समय श्री मुरलीधर बोरसूदकर, सत्यवान बिचारे, श्रीकान्त बेड़ेकर, शृंगारपुर के दीपक म्हस्के व विनायक म्हस्के तथा मेरे अधिकारी मित्र दिनकर पाटील व. वसन्त पाटील ने उत्साह से सहयोग किया। भयंकर मालेघाट देखते समय सत्यवान बिचारे सर्पदंश के शिकार हो गये थे। साधन सामग्री की आपूर्ति करने वाले पूर्व केन्द्रीय मन्त्री रमाकान्त खलप और नासिक के लोकेश शेवड़े का भी मैं हृदय से आभारी हूँ। श्री उद्धव ठाकरे ने स्वयं हेलिकाप्टर से जंजीरा और रायगढ़ किले के स्वयं लिए गये दो छायाचित्र उपलब्ध कराए। मैं उनका आभारी हूँ। इस ग्रन्थ के महत्त्व की वृद्धि करने वाले अनेक छायाचित्र खींचने वाले, स्थान-स्थान पर मेरे साथ भटकने वाले छायाचित्रकार प्रवीण देशपाण्डे का मैं आभार मानता हूँ। इस उपन्यास के लेखन में मेरे मित्र उपन्यासकार श्री अनन्त सामन्त श्री सम्भाजी जाधव, मेरी पत्नी सौभाग्यवती चन्द्रसेना पाटील, बन्धु सुरेश पाटील, कविवर्य केलुसकर के साथ हुई चर्चाओं का बड़ा उपयोग हुआ है। मेरे मित्र गजलकार श्री दिलीप पांढरपट्टे के साथ विचार-विमर्श से उर्दू भाषा के उपयोग में महत्त्वपूर्ण सहायता मिली। इस उपन्यास की पांडुलिपि तैयार करने में श्री पंडित आलुगड़े की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। मैं उनकी लगनशीलता और कार्यकुशलता के लिए उन्हें शाबासी देता हूँ। श्री शंकर सारडा, डॉ. म.द. हातकडंगलेकर, निर्मल भट्टाचार्य, वामन भोवाल, सुहास सोनावणे, कल्याण तावरे, डॉ. सुवर्णा निंबालकर विलास राठौड़, डॉ. हिकमत उदान, प्रा अशोक गोडबोले, श्री रमेश कीर आदि ने मुझ पर और मेरे साहित्य पर सदैव ही स्नेह की वर्षा की है। उनके ऋण से उऋण होना सम्भव नहीं। चित्रकार श्री चन्द्रमोहन कुलकर्णी ने चित्रांकन की जिम्मेदारी सफलतापूर्वक निभाई। उसी तरह इस वृहद उपन्यास को समय पर और सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रकाशित करने के लिए श्री अनिल और सुनील मेहता-पिता-पुत्रों का आभारी हूँ। प्रकाशन के सन्दर्भ में 'मेहता पब्लिशिंग हाउस' की श्रीमती चारुलता पाटील और सम्भाजी :: 783
अश्विनी खेर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ। मुझे विश्वास है कि आज तक जिस आत्मीयता से मेरे उपन्यासों का मराठी भाषा में आदर होता रहा है उसी प्रकार 'सम्भाजी' का भी होगा। उसी प्रकार अन्य भारतीय भाषाओं में असंख्य पाठकों की ममता मुझे मिलेगी। प्रस्तुत उपन्यास में दिनांक, सन् और अन्य विवरण अँग्रेजी पद्धति से केवल पाठकों की सुविधा के लिए दिए गये हैं। पाठक कृपया इस बात को ध्यान में रखें। 17. सम्भाजी महाराज के व्यक्तित्व और चरित्र पर अभिनव प्रकाश डालने का महत्त्वपूर्ण कार्य सबसे पहले वा.सी. बेन्द्रे ने किया। उसके पश्चात् सेतु माधवराव पगड़ी, कमल गोखले, विजय देशमुख से लेकर डॉ. जयसिंहराव पवार और डॉ. सदाशिव शिवदे तक लोगों ने निरन्तर यह कार्य किया है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर जैसे क्रान्तिपुरुष ने भी सम्भाजीराजा के गौरवपूर्ण कार्यों का उल्लेख अनेक बार बड़े आदर से किया है। दिनांक 26 फरवरी, 1908 को सन्ध्या समय सोलापुर में दासनवमी के उत्सव के अवसर पर लोकमान्य तिलक ने एक भाषण दिया था। उस भाषण में शिवपुत्र सम्भाजी का गुणगान करते हुए उन्होंने एक स्वरचित संस्कृत श्लोक कहा था। उसी श्लोक से मैं अपने इस निवेदन की पूर्णाहुति करता हूँ- "स्वधर्मे निधनं श्रेयो गीतावचनं उज्ज्वलम् शिवसुतोश्च हौतात्म्यं धर्मराष्ट्रकृत्ये खलु ते।।" -विश्वास पाटील 784 :: सम्भाजी
संदर्भ साधने
- ऐतिहासिक साधने (1588 से 1821) सम्पादक : शां. वि. आवळसकर
- श्री शिवछत्रपतींची 91 कलमी बखर आणि भोसले घराण्याची चरित्रावली वि. स. वाकसकर
- हिन्दवी स्वराज्य आणि मोगल सेतुमाधवराव पगडी
- श्री शिवछत्रपती-संकल्पित शिवचरित्राची प्रस्तावना, आराखडा व साधने त्र्यं. शं. शेजवलकर
- भारतवर्षीय मध्ययुगीन चरित्रकोश सि. वि. चित्राव
- अर्वाचीन महाराष्ट्रेतिहासातील राज्यकारभाराचा अभ्यास (भाग 1 ला) शं. ना. जोशी
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- कवीन्द्र परमानन्दकृत श्री शिवभारत सम्पादक : सदाशिव महादेव दिवेकर
- मल्हार रामराव चिटणीस विरचित सम्पादक : र. वि. हेरवाडकर श्रीमन्त छत्रपती सम्भाजी महाराज आणि थोरले राजाराम महाराज यांची चरित्रे
- मराठ्यांच्या इतिहासाची साधने-पोर्तुगीज सम्पादक : ए. बी. द. ब्रागांस परेरा दप्तर-खंड तिसरा आशिया विभाग अनुवादक- स. शं. देसाई (1 ते 5) सम्भाजी :: 785
- मराठी साम्राज्याची छोटी बखर र. वि. हेरवाडकर
- औरंगजेब-शक्यता आणि शोकांतिका रवीन्द्र गोडबोले
- रायगडची जीवनगाथा शान्ताराम विष्णू आवळसकर
- सम्भाजीकालीन पत्रसारसंग्रह सम्पादक : शं. ना. जोशी
- श्री छत्रपती आणि त्यांची प्रभावळ सेतुमाधवराव पगडी
- ताराबाईकालीन कागदपत्रे खंड 1 ला सम्पादक : अप्पासाहेब पवार
- कृष्णाजी अनन्त सभासद-विरचित शिवछत्रपतींचे चरित्र सम्पादक : प्रा. दत्ता भगत
- मराठे व औरंगजेब सम्पादक : सेतुमाधवराव पगडी
- मराठी रियासत खंड 1 गोविन्द सखाराम सरदेसाई
- मराठ्यांचे स्वातंत्र्ययुद्ध सम्पादक : सेतुमाधवराव पगडी (खाफीखानाचा साधनग्रन्थ)
- शिवकालीन महाराष्ट्र वा. कृ. भावे
- पोर्तुगीज-मराठे सम्बन्ध- डॉ. पांडुरंग सखाराम पिसुर्लेकर अर्थात पोर्तुगीजांच्या दप्तरातील मराठ्यांचा इतिहास
- महाराष्ट्राची धारातीर्थे पं. महादेवशास्त्री जोशी (भाग पहिला, दुसरा)
- प्रभूरत्नमाला सखाराम गणेश मुजुमदार
- श्री शिवछत्रपती विजय सौ. विभा वा. दातार
- आज्ञापत्रे आणि राजनीति-रामचन्द्रपन्त सम्पादन : शं. ना. जोशी अमात्य
- श्री मच्छंभूनृपविरचितम् बुधभूषणम् एच. डी. वेलणकर (सम्पादक) (संस्कृत-इंग्लिश)
- तंजापुरी श्री बृहदीश्वरालयस्थ शिलालेखित भोसले वंश चरित्र- श्री. वे. निवासाचार्य (द्राविडी भाषान्तर) श्री. एस. गोपालन-
- मराठ्यांच्या इतिहासाचा मागोवा (पूर्वार्ध) पी. एन. देशमुख
- सह्याद्री (महाराष्ट्र स्तोत्र) सदाशिव आत्माराम जोगळेकर
- श्री छत्रपती सम्भाजी महाराज यांचे विचिकित्सक चरित्र वा. सी. बेंद्रे
- अहकामे आलमगिरी-औरंगजेबाची सेतुमाधवराव पगडी आज्ञापत्रे 786 :: सम्भाजी
- शिवपुत्र सम्भाजी डॉ. सौ. कमल गोखले
- औरंगजेबनामा अनुवादक : मुंशी देवीप्रसादजी
- मराठ्यांचे स्वातंत्र्यसमर (पूर्वार्ध) छत्रपती सम्भाजी प्रा. श. श्री. पुराणिक
- साद सह्याद्रीची ! भटकंती किल्ल्यांची प्र. के. घाणेकर
- छत्रपती सम्भाजी स्मारक-ग्रन्थ डॉ. जयसिंगराव पवार
- शहेनशहा ना. सं. इनामदार
- ज्वलज्ज्वलनतेजस सम्भाजीराजा डॉ. सदाशिव शिवदे
- आंगरेकालीन अष्टागार प्रकाशक : शां. वि. आवळमकर
- असे होते मोगल ज स. चौबळ
- महाराणी येसूबाई डॉ. सदाशिव शिवदे
- रायगड किल्ल्याचे वर्णन गोविन्द बाबाजी जोशी
- राजेशिर्के घराण्याचा संक्षिप्त इतिहास राम राजेशिर्के
- शिवस्नुषा महाराणी येसूबाई सुशीला खेडकर 49 नियतीच्या विळख्यात औरंगजेब सेतुमाधवराव पगडी
- मराठेशाहीतील मनस्विनी डॉ. सु. र. देशपांडे
- हुतात्मा सम्भाजी : एक विवाद्य शंकरराव सावन्त व्यक्तिमत्त्व
- मराठेशाहीचा मागोवा डॉ. जयसिंगराव पवार
- श्रीमान योगी रणजित देसाई
- शहजादा दारा शुकोह सदाशिव आठवले
- इतिहासाचा मागोवा सेतुमाधवराव पगडी
- दर्यादिल काका विधाते
- धर्मवीर छत्रपती सम्भाजी महाराज अरुण जाखडे
- मराठ्यांच्या इतिहासाची साधने विश्वनाथ काशिनाथ राजवाडे
- राजा शिवाजी : वाङ्मयीन मिथ डॉ. दत्ता पवार
- तारे जंजिऱ्याचे गजानन बागडे
- अर्घ्य नयनतारा देसाई
- छत्रपती सम्भाजी प्र. के. घाणेकर
- इथे ओशाळला मृत्यु (नाटक) वसन्त कानेटकर
- शिवपुत्र राजकुंवर बोबडे
- रायगडाला जेव्हा जाग येते (नाटक) वसन्त कानेटकर
- राजा शम्भू छत्रपती विजय देशमुख सम्भाजी :: 787
- छावा (नाटक) शिवाजी सावन्त
- महाड गॅझेट प्रभाकर रघुनाथ भुस्कुटे
- बेबंदशाही (नाटक) वि. ह. औंधकर
- इतिहाससंग्रह सं. : दत्तात्रय बळवन्त पारसनीस
- राजसंन्यास (नाटक) राम गणेश गडकरी
- भोसला दरबार के हिन्दी कवि डॉ. कृष्ण दिवाकर
- छत्रपती शिवाजी महाराज जीवन-रहस्य नरहर कुरुंदकर
- मराठ्यांचा आत्मयज्ञ (नाटक) नाथमाधव
- सती गोदावरी (नाटक) शंकर बळवन्त चव्हाण
- छत्रपती सम्भाजी लोककवी मनमोहन
- शोधनिबन्ध संग्रह भास्कर धातावकर 78 कादंबरीमय शिवकाल गो. नी. दांडेकर
- सम्भाजीमहाराजांचे चरित्र कै. भाऊसाहेब पवार
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- Administrative System of Surendranath sen the Marathas
- House of Shivaji J.N. Sarkar
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- Historical Fragments of Orme Mughal Empire ☐ ☐ ☐ सम्भाजी :: 789
श्री विश्वास पाटील की साहित्य सम्पदा
- पानीपत मराठी, राजहंस प्रकाशन, पुणे (24वाँ संस्करण) हिन्दी अनुवाद—मो.ग. तपस्वी, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली (5वाँ संस्करण) गुजराती अनुवाद—डॉ. प्रतिभा दवे, नवभारत साहित्य मन्दिर, अहमदाबाद पंजाबी अनुवाद—प्रकाशन विभाग, पंजाब सरकार, पटियाला कन्नड़ अनुवाद—डॉ. चन्द्रकान्त पोकळे, साहित्य अकादमी, बंगलोर
- पांगिरा मराठी, राजहंस प्रकाशन (पाँचवाँ संस्करण) हिन्दी, प्रकाश भातभेडकर, वाणी प्रकाशन, दिल्ली कन्नड़, डॉ. चन्द्रकान्त पोकळे, साहित्य अकादमी, बंगलोर
- झाड़ाझड़ती मराठी, राजहंस प्रकाशन (ग्यारहवाँ संस्करण) हिन्दी, डॉ. गजानन चव्हाण, वाणी प्रकाशन, दिल्ली (तीसरा संस्करण) कन्नड़, डॉ. चन्द्रकान्त पोकळे, साहित्य अकादमी, बंगलोर अँग्रेजी, डॉ. कीर्ति रामचन्द्र, इंडिया लॉग प्रकाशन, दिल्ली उर्दू, साजिद रशीद, साहित्य अकादमी, दिल्ली गुजराती, डॉ. प्रतिभा दवे, नवभारत साहित्य मन्दिर, अहमदाबाद मलयालम, कालियाथ दामोदरन, साहित्य अकादमी, दिल्ली असमिया, भरत ठाकुर
- महानायक मराठी, राजहंस प्रकाशन, पुणे (आठवाँ संस्करण) हिन्दी, डॉ. रामजी तिवारी और रमेश तिवारी, भारतीय 790 :: सम्भाजी
ज्ञानपीठ, दिल्ली (छठाँ संस्करण) गुजराती, डॉ. प्रतिभा दवे, आर.आर. सेठ एंड कं. अहमदाबाद। (दूसरा संस्करण) कन्नड़, डॉ. चन्द्रकान्त पोकळे, साहित्य अकादमी बंगलोर (दूसरा संस्करण) राजस्थानी, सत्यनारायण स्वामी, साहित्य अकादमी, दिल्ली मलयालम, प्रा.पी. माधवन पिल्लई, डी.सी. बुक्स, कोट्टायम अँगेजी, डॉ. कीर्ति रामचन्द्र, इंडिया लॉग प्रकाशन, दिल्ली (दूसरा संस्करण) बंगाली, दीपेन चक्रवर्ती, आनन्द बुक पब्लिशर्स कलकत्ता उड़िया, न्यू एज पब्लिकेशन, कटक तमिल, डॉ. एस. सुब्रह्मणम् (प्रकाशय) 5. रणांगण मराठी, मजेस्टिक प्रकाशन, मुम्बई 2000 (नाटक) 6. चन्द्रमुखी मराठी, राजहंस प्रकाशन, पुणे (दूसरा संस्करण) हिन्दी, डॉ. रामजी तिवारी और रमेश तिवारी, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली मलयालम, कालियाथ दामोदरन, मातृभूमि प्रकाशन, त्रिवेन्द्रम सम्भाजी :: 791