छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहत्त्वपूर्ण किलों का अधिकार औरंगजेब को लेना था। उस कालखंड में महारानी येसूबाई, दुर्गाबाई और सम्भाजी के सभी कुटुम्बियों पर कितने अरिष्ट टूट पड़े थे इसकी केवल कल्पना की जा सकती है। 14. ताराबाई के समय के दस्तावेजों में अर्जोजी यादव का मूल पत्र मौजूद है। उसमें 'मातो श्री दुर्गाबाई से मिलकर आया' ऐसा स्पष्ट उल्लेख है। इससे यह शंका निर्मूल हो जाती है कि दुर्गाबाई सम्भाजी की पत्नी थीं अथवा उपपत्नी। 15. बखरकार और इतिहासकार जिस तरह दिखाते हैं, वैसी औरंगजेब की विवाहयोग्य उस समय कोई लड़की नहीं थी। इसलिए नाटकों के अनुसार सम्भाजी द्वारा उसके हाथ माँगने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसके अतिरिक्त यह कहना कि सम्भाजी जीवन भर विलासी और बदचलन था किन्तु आँखों के आगे मृत्यु को देख धार्मिक बन गया। एक दिन के लिए ही क्यों न हो 'धर्मवीर' बन गया, ठीक नहीं है। जिन्दगीभर व्यसनी और बदचलन व्यक्ति बादशाह के पास जनानखाने की चाभी माँगेगा। क्योंकि उसकी मूलवृत्ति वही है। बाकी की बकवास क्यों करता बैठेगा? कुछ लोग सम्भाजी राजा की मृत्यु के सन्दर्भ में फिल्मी ढंग से हृदय परिवर्तन की बात करते हैं। यह पूर्णतया असत्य है। सत्य तो यह है कि युगपुरुष शिवाजी महाराज के योग्य पुत्र सम्भाजी राजा अपने पिता के पुण्य के प्रति सजग बने रहे। औरंगजेब के विरुद्ध अंबर के राजा रामसिंह को संस्कृत में लिखा गया पत्र आज भी उपलब्ध है। उसमें औरंगजेब जैसे शत्रु को नेस्तनाबूद करने के लिए उत्तर के राजाओं को एक होने का आवाहन किया गया है। सम्भाजी राजा को मराठा नौसेना का महत्त्व अच्छी तरह ज्ञात था। इसीलिए शिवाजी महाराज के बाद उन्होंने एक भी बेड़ा कम नहीं होने दिया। मुम्बई बन्दरगाह का महत्त्व समझने के कारण ही उन्होंने अंग्रेज गवर्नर केजविन से मुम्बई खरीदने का प्रयास किया। अन्त में उन्होंने कराल काल के मुँह में अपना सिर दे दिया किन्तु सह्याद्रि का एक भी महत्त्वपूर्ण किला औरंगजेब के हाथ में नहीं जाने दिया। त्रिचनापल्ली से बुरहानपुर तक उन्होंने अपनी तलवार का चमत्कार दिखाया। जिस उद्देश्य से वे आठ वर्ष तक जूझते रहे, उसी ध्येय से आयु के मात्र बत्तीसवें वर्ष में मृत्यु के सामने गये। 16. इस बृहद उपन्यास के लेखन में मेरे अनेक मित्रों और शुभेच्छुओं ने आत्मीय सहयोग प्रदान किया, उन सभी का मैं हृदय से आभारी हूँ। महान शोधकर्ता डॉ. र.वि. हेरवाडकर की पुत्री सौभाग्यवती शिरीन कुलकर्णी ने हेरवाडकर के संग्रहों में से अनेक ग्रन्थ उपलब्ध कराए। इन ग्रन्थों से मुझे बड़ी सहायता मिली। इसी प्रकार डॉ. सदाशिव शिवदे ने अपने संग्रह से अनेक दस्तावेज उपलब्ध कराए। इसके लिए मैं उनका सदैव ऋणी रहूँगा। आज महाराष्ट्र में सम्भाजी के साहित्य पर 782 :: सम्भाजी