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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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तैनात थी। फिर यह राजपुत्र असावधान कैसे था ? शादी-ब्याह के अवसर पर सौ- दो सौ लोगों की अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़े तो कमर टेढ़ी हो जाती है। यह बत्तीस वर्ष का शिवपुत्र प्रचंड अकाल, बादशाह से मिल गये अपने सगे बहनोइयों, धोखेबाज देशद्रोही जागीरदारों से अकेला जूझ रहा था। अपनी साठ-सत्तर हजार की सेना लेकर औरंगजेब की विशाल सेना का मुकाबला करने के लिए शिवपुत्र को कितनी तैयारी करनी पड़ी होगी ? इसकी कल्पना की जा सकती है। 12. सम्भाजी महाराज ने दक्षिण में जो दो अभियान किये, उसकी ओर डॉ. बी. मुद्धाचारी के अतिरिक्त किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। आज भी दक्षिण में सम्भाजी के अभियान की साक्षी देने वाले अनेक शिलालेख तमिल और कन्नड़ भाषा में उपलब्ध हैं। किन्तु उनकी ओर ध्यान देने वाला कोई नहीं है। कुछ महीने पहले मैं अपने एक आई.ए.एस. श्रेणी के अधिकारी आनन्द पाटील (जिलाधिकारी, शिवगंगा, तमिलनाडु) के साथ त्रिचनापल्ली गया था। आज पाषाणकोट वहाँ पर बोधचिह्न के रूप में प्रयुक्त होता है। आज भी पाषाणकोट के पास बैठकर कावेरी के पाट को देखते हुए दिल धड़कने लगता है। एक समय कावेरी नदी में घोड़ा कुदाकर सम्भाजी ने पाषाणकोट को किस तरह जीता ? इसकी कल्पना से शरीर काँप उठता है। जंजीरा के पास सम्भाजी द्वारा बनाए गये सेतु के कुछ पत्थर आज भी उस अतीत का साक्ष्य दे रहे हैं। सम्भाजी के साथ धोखा श्रृंगारपुर के पास मालेघाट की सँकरी राह आज भी उतनी ही भयानक, अन्धकारभरी और रहस्यमय दिखाई पड़ती है। बस के आने जाने के लिए दूसरी ओर अनुस्कुरा घाट को तोड़कर रास्ता बनाया गया है फिर भी अनेक वाहनों के लिए प्राणघातक सिद्ध होता है। उसके समीप से आज भी सम्भाजी के समय की टूटी-फूटी राह विद्यमान है। 'मगनलाल ड्रेस वाला' के किराए के कपड़े पहनकर मद्यपी के रूप में रंगमंच पर नाचने वाला सम्भाजी कोई और है। किन्तु सह्याद्रि की घाटियों को ढाल की तरह उपयोग करने वाला, घोड़े पर अपना सिंहासन लादकर बादशाही फौज से जीवनभर संघर्ष करने वाला, महाराष्ट्र के इतिहास को कल्पान्त तक कायम रखने वाला सम्भाजी बहुत-बहुत अलग है। 13. सम्भाजी का दुखद अन्त बहुत दारुण था। जिस प्रकार नाटककार तीसरे अंक में औरंगजेब और सम्भाजी को आमने-सामने खड़ा करते हैं, वस्तु स्थिति वैसी नहीं है। संगमेश्वर में धोखे से पकड़े जाने के बाद से उनकी तुलापुर की मृत्यु तक की चालीस दिनों की कालावधि अत्यन्त पीड़ादायी है। बादशाह ने दारा जैसे अपने सगे भाई को भी दो-चार दिन की ही कैद दी थी। किन्तु सम्भाजी से उनके सभी सम्भाजी :: 781