भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 772, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 772

धोने वाले कपड़ों को वैसे समेटकर जना तत्काल पीछे मुड़ी। वह अपने गाँव की ओर सरपट भागने लगी। उसने पाटील के बाड़े में कपड़ों की गठरी को नीचे गिरा दिया। उसकी यह दशा देखकर राधाबाई पाटील ने पूछा, "क्या हो गया है, आज तुझे? कपड़े बिना धोये ही वापस लेकर आ गयी। नदी के घाट पर कोई साँप बिच्छू देख लिया क्या?" "अपने गाँव के सयानों में साहस नहीं रह गया तो क्या जाता है? वैसे ही नाग की तरह मुवों को घूमने दो।" जना ने चिढ़कर कहा। "क्या कह रही हो, जना?" "माँ जी, शिवाजी महाराज के बेटे की अंतड़ियाँ निकालकर उस बादशाह ने नदी की रेत में फेंक दी हैं। इसकी शर्म हमारे गाँव के मर्दों को क्यों नहीं आ रही है? ये मुये रणुए क्यों मूँछों पर ताव देते हैं और बाजार में सीना तानकर चलते हैं?" यह खबर सुनते ही राधाबाई पाटील के हाथ का निवाला नीचे गिर गया। पाटील के बाड़े के पास बढ़इयों के बाड़े और गाँव की चौपाल में भी यह दुखद समाचार पहुँचा। समाचार पाते ही गाँव का कलेजा दहल गया। महादेव के मन्दिर में पिछले कुछ दिनों से गोरखनाथ बाबा ठहरे हुए थे। गाँव के वरिष्ठ लोग दौड़कर गये। वे भी दुख से काँप गये। यह दुखद समाचार उनके कानों तक पहले ही पहुँच चुका था। उसी शाम को दामाजी पाटील कोरेगाँव से लौट आये। लोग आकर उनके आसपास जमा हो गये। 'दुहाई हो माई-बाप' गोपाल नाक चिल्लाते हुए आया। पुनः महादेव मन्दिर के चबूतरे पर गाँव वालों का जमावड़ा हुआ। सभी के मन उदास थे। बादशाह के कृत्य से सभी का कलेजा काँप गया था। भय के कारण उनके शरीर में कँपकँपी छूट रही थी। शम्भूराजा की हत्या के समाचार से सभी को पीड़ा हो रही थी। अनेक लोगों की आँखों में आँसू भरे थे। अपने को न रोक पाकर गोरखनाथ जी बोले, "और तो कुछ नहीं, किन्तु महाराज के बेटे का रक्त-मांस अपने गाँव की सीमा के पास पड़ा रहे और हम चुपचाप बैठे रहें, यह सोचकर दुख हो रहा है?" "आपकी बात सच है महाराज।" मन्दिर के बाहर बैठा गोविन्द नाक बोला, "शिवाजी महाराज ने इस प्रदेश में अपने बाल-बच्चों पर कुछ कम उपकार किये हैं क्या? आज उनके बेटे की अंतड़ियों के लोथड़े हमारी सीमा पर पड़े हैं और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें यह ठीक नहीं है। पाटीलजी आप सोचें।" दामाजी पाटील आस्तिक वृत्ति का व्यक्ति था। पंढरीनाथ की नियमित सेवा करता था। तुकोबा के चिरंजीव, नारायण महाराज को पिछले कुछ वर्षों से सरकारी सहायता मिल रही थी। शम्भूराजा के समय में ही देहू से पंढरपुर के लिए पालकी 770 :: सम्भाजी