छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलगाकर नीचे खींचने लगे। राजा की त्वचा चर्र-चर्र करके फटने लगी। चमड़ी छिलने लगी, आँतड़ियां टूटने लगीं। उन दोनों जल्लादों के हाथों से छिलने पर रक्त के फौवारे छूटने लगे। रक्त की धारा नीचे जमीन पर गिरने लगी। सम्भाजी राजा ने अपनी जान बचाने के लिए कोई मिन्नत नहीं की। वे अपने दाँतों को बिठाकर अत्याचार को सहने का प्रयास कर रहे थे। किसी पुराने कपड़े की तरह राजा का शरीर चिन्दी-चिन्दी हो रहा था। वह रक्तरंजित गोला अपनी जगह पर थरथरा रहा था। अंगों से रक्त के फौवारे छूट रहे थे। महादेव की पिंडी पर चढ़ाया गया दूध-दही जिस प्रकार नीचे जमा हो जाता है उसी प्रकार राजा के पैरों के पास रक्त जमा हो रहा था। बकरे की तरह राजा की छिली देह को देखकर औरंगजेब खिलखिलाकर हँस रहा था। राजा का फटा हुआ जीवित शरीर अपनी जगह पर फड़फड़ा रहा था। दोनों जल्लाद सम्भाजी राजा के शरीर को छीलकर एक तरफ हो गये। उसके बाद बादशाह ने फर्सीधारी पाँच जल्लादों की ओर इशारा किया। उन दैत्यों के हाथों में हलचल हुई। दूसरे ही क्षण वे सम्भाजी राजा पर टूट पड़े। एक ने अपनी कुल्हाड़ी की तेज धार सम्भाजी राजा की गर्दन में घुसा दी। रक्त की धार उठी, आधी खोपड़ी कट गयी। गर्दन से नीचे लटकने लगी। इसके बाद ही एक दूसरा वार किया गया जिससे सिर धड़ से अलग हो गया। सम्भाजी का सिर उठाकर बादशाह के सामने लाया गया। औरंगजेब ने उसे हाथ में लिया। उसने रक्त से सनी हुई दाढ़ी पर हाथ फिराया। वह बहुत प्रसन्न था। कुछ वर्ष पूर्व उसने अपने बड़े भाई दारा की खोपड़ी भी बड़ी भावशून्य दृष्टि से देखी थी। इस खोपड़ी को असदखान को सौंपते हुए बादशाह गरजा, "इस काफिर बच्चे के सिर को भाले में लटकाकर गाँव-गाँव घुमाओ, सभी के बीच दहशत फैलाओ। यह औरंगजेब जब तक जिन्दा है तब तक दक्खन में कोई दूसरा सम्भाजी पैदा न हो।" औरंगजेब ने जल्लादों की ओर पुनः इशारा किया। वे सम्भाजी राजा पर टूट पड़े। खम्भे से जकड़े शरीर से रक्त की धारा बहने लगी। धारदार कुल्हाड़ियों से कटकर शरीर का रक्त-मांस नीचे बिखरने लगा। भीमामाई सहम गयी। अँधेरे में डूबा सगा सह्याद्रि दुःख से काँप गया। शाही हुक्म हुआ। उसके अनुसार हाड़-मांस के टुकड़े एकत्र किये गये। मुर्दाखोरों ने उन्हें भीमा नदी के किनारे फेंक दिया। कुछ टुकड़े नदी की धारा में पड़े और कुछ किनारे पर। बादशाह को अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण कार्य को पूरा करने की प्रसन्नता हुई। सम्भाजी :: 765