छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबादशाह सामने की कछार चढ़कर झपाटे से उस अँधेरी रात में ऊपर आया। इस विजय के लिए आलमगीर ने कितना खून पसीना बहाया था? लाखों मनुष्यों और जानवरों को मारा था, पागल कर दिया था अथवा भयंकर रोग के मुख में झोंक दिया था। थका-हारा बादशाह उस रात्रि बेला में, तुलापुर के भीमा कछार पर आकर खड़ा हो गया। उस घुप्प अँधेरे में नदी की काली धारा की ओर आहत दृष्टि से देखने लगा। बादशाह के डेरे में विजय की सूचक नौबत बजी। हर्षोल्लास से सैकड़ों तासे-ढोल एक साथ बजने लगे थे। हजारों मुगल सैनिक बाजार में खुशी से नाचने लगे थे। मशालों का नृत्य आरम्भ हो गया था। 'सम्भा मर गयाऽऽ, सम्भा कत्ल किया गयाऽ' ऐसा चिल्लाते हुए घुड़सवार जोर-जोर से शोर मचा रहे थे। यह अमावस्या की रात इन दैत्यों के लिए उत्सव की रात बन गयी। आसमान में विजय की चन्द्रज्योति प्रकाशित हुई। चारों ओर हर्षोल्लास का वातावरण छाया था। कछार पर खड़ा बादशाह आतंकित-सा बार बार नदी की धारा की ओर देख रहा था। वह क्षणभर के लिए हैरान हुआ कि कहीं वहाँ काले पानी में सम्भाजी तो नहीं खड़ा है? उसे शंका हो रही थी, किन्तु उसके आसपास त्योहार जैसा उत्सव फौज मना रही थी। शंका के लिए कोई अवकाश शेष नहीं था! समाप्त कर दिया गया काफिर बच्चा अन्ततः समाप्त हो गया था। पिछले आठ वर्षों में जिसने मुगल सेना के लाखों लोगों और जानवरों को विनष्ट करने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया था, आखिर समाप्त हो गया। उस जहन्नमी शिवाजी का दुष्ट छोकरा समाप्त हो गया। औरंगजेब बड़ी राहत का अनुभव कर रहा था। वह बड़ी प्रसन्नता से हँसा, खिलखिलाकर हँसा, बार-बार हँसा। यह सफलता इतनी बड़ी थी कि बादशाह विदूषक की भाँति खूब हँसा। धीरे धीरे उसकी हँसी बन्द हो गयी। पहला दौर समाप्त हो गया। बादशाह के अंगों में कूट-कूटकर भरा हुआ क्रूर हैवान आलमगीर के अति हिंसात्मक रूप को देखकर दूर भाग गया। बादशाह के अंग-प्रत्यंग में एक अनाम खालीपन भर गया था। वह घबराने लगा। उसे अपनी कामयाबी से ही भय लगने लगा। खालीपन उसे खाने लगा, बेचैन करने लगा। वह सोचने लगा कि यदि सम्भा सचमुच समाप्त हो गया है तो इसके बाद वह लड़े तो किसके विरुद्ध? 'बादशाह सलामत चलिए! हजरत चलिए।' इस आवाज से औरंगजेब का ध्यान टूटा। वह होश में आया। शहाबुद्दीनखान, रूहूल्लाखान, हसनअलीखान जैसे बड़े सरदार नदी के किनारे की ओर दौड़ पड़े थे। उन्हें अपने मालिक की इस दिग्विजय पर बधाइयाँ देनी थीं। रूहूल्लाखान बड़े उत्साह से बोला, "चलिए हजरत आपको मुबारकबाद देने के लिए सारी फौज बेताब हो रही है। अपने खास 766 :: सम्भाजी