छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसरदारों ने वहीं पर फतह की बड़ी महफिल सजा रखी है।" "वहाँ पर मरगट्टों के बड़े बड़े ब्राह्मण, जमींदार और अनेक मराठा जागीरदार खासतौर पर हाजिर हैं। चलिए, उनसे मुलाकात कीजिए।" हसनअलीखान ने साग्रह कहा। बादशाह कुछ अजीब ढंग से हँसते हुए बोला, "क्या मिलना उन मराठा कुत्तों से? जागीर की लालच में आये कुत्ते, उनकी परवाह कौन करता है?" "लेकिन, लेकिन जहाँपनाह?" "उन मूर्खों पर गर्व करने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें यदि आज धक्का मारकर बाहर निकाल दिया जाये तो कल वे फिर पैरों में पूँछ दबाए ये नामर्द फिर आ जाएँगे।" "लेकिन जहाँपनाह, फौज को आपसे एक बहुत जरूरी काम है।" इखलामखान बादशाह के नंगे सिर की ओर देखते हुए बोला। "आपके सिर पर कितने सालों से ताज नहीं—" "अँ?" "जी हाँ, मेरे आका, चलिए आपऽ। वर्षों से आपके ताजविहीन सिर को देखकर हम फौजियों को शर्म आती रही है। सम्भा का खात्मा किये बगैर सिर ताज धारण न करने की सौगन्ध आपने पाँच वर्ष पहले ली थी। कल्याण के एक विशेष सुनार से आधे करोड़ की कीमत का, हीरे जवाहरात वाला राजमुकुट हमने आपके लिए तैयार करवाया है।" "हाँ, हाँ हुजूर! चलिए आज वह मुकुट पूरी शानो शौकत के साथ आपकी खिदमत में पेश करना है।" एक साथ पाँच-छह लोग बोल पड़े। "इसकी क्या वजह है?" बादशाह ने खिन्न मन से पूछा। "आपकी इस महान बहादुरी के लिए। एक निहायत नापाक, नादान दुश्मन को आपने आज जिन्दा कत्ल कर दिया। आपने तो बहुत बडी फतह हासिल की है हजरतऽ।" अपने साथियों द्वारा की जाने वाली प्रशंसा से बादशाह ऊब चुका था। वह चलते चलते रुक गया। ऐसा लगा जैसे उसका दम फूल रहा हो। वह सोच नहीं पा रहा था कि सत्य बात को कहे या न कहे। उसके भीतर का कठोर शासक उसके पापों के द्वार पर कड़ा पहरा दे रहा था। किन्तु उसके अन्तरतम में बैठी मानवीय आत्मा द्रवित हो गयी थी। वह अपने बादशाह के अनुशासन को धोखा दिया। आँखों की पुतलियों के पीछे भरे आँसुओं को वह सँभाल नहीं पाया, उनकी सीमा टूट गयी। पहरेदारों की चिन्ता किये बिना उसकी आँखों से तीन बूँद आँसू ढरक गये, गालों से होते उसकी सफेद दाढ़ी में समा गये। सम्भाजी · 767