छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 780, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंका समर्थन किया। यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है। कुडालकर बाकरे शास्त्री संस्कृत दानपत्र में, जो आज भी उपलब्ध है, सम्भाजी का वर्णन करते हुए बताते हैं कि वे भावुक मन के राजकुमार और स्फटिक से भी निर्मल थे। रियासती का 'उग्र प्रकृति सम्भाजी' खंड शीर्षक के साथ ही मिथ्या विधानों से भरा पड़ा है। 5 यह सब विस्तार से लिखने का कारण यह है कि मल्हारराव की बड़ी भूलों को रियासतकार ने ज्यों का त्यों ग्रहण कर लिया। नाटककारों ने 'रियासती' को श्रेष्ठ ऐतिहासिक कृति के रूप में देखा। सम्भाजी मराठी नाटकों के लिए एक अन्यतम विषय सिद्ध हुआ। मराठी में इस एक विषय पर सत्रह से भी अधिक नाटक लिखे गये हैं। नाटककारों को प्रतिभा के अनेक विलक्षण पंख फूटे हैं। रायगढ़ पर गंगासागर नामक तालाब में उन्होंने कल्पना की नाव छोड़ी। उसी नाव में बैठकर येसूबाई नौकाविहार करती हैं। नाव से उतरकर वे झटपट रंगमंच पर प्रवेश करती हैं। मंच पर उनका प्रवेश अपने चरित्रभ्रष्ट पति की आलोचना के लिए ही होता है। कवि कलश के परिचय के लिए जब मंच पर पर्दा उठता है तो उन्हें भैंसे की खाल पर अनुष्ठान करते हुए बिठाया जाता है। भैंसे की गीली या सूखी खाल कितनी सख्त और मोटी होती है? उसे बिछाने के लिए कितने लोग लगेंगे? इस पर बैठने वाला व्यक्ति कितना विचित्र लगेगा? एक पुराने रंगकर्मी ने मुझे बताया कि कवि कलश के मंच पर प्रवेश के लिए हम भैंसे की खाल की जगह बकरे की खाल बिछाते थे। 6 प्रा नरहर कुरुंदकर 'श्रीमान योगी' की प्रस्तावना में लिखते हैं, "सम्भाजी ने पुर्तगालियों के तीन-चौथाई राज्य को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। कर्नाटक का राज्य दुगुना हो गया, सेना पहले से दुगुनी हो गयी। शिवाजी की राजनीति का विकास सम्भाजी में दिखाई पड़ता है।" कुरुंदकर ने सन् 1960 में एक विस्तृत लेख लिखकर सम्भाजी के चरित्र पर उज्ज्वल प्रकाश डाला था। अरबी और फारसी दस्तावेजों के आधार पर सेतु माधव पगड़ी जैसे वरिष्ठ अध्येता सम्भाजी के सम्बन्ध में जीवनभर बड़े आदर और गौरव से लिखते और बोलते रहे। शिवपुत्र सम्भाजी ने हिन्दुस्तान के पुर्तगाली शासकों को किस तरह हैरान किया? इसका प्रमाण उन पत्रों में उपलब्ध है जो पुर्तगाली वाइसराय कांट दी आल्होर ने अपने पुर्तगाल के राजा को लिखे थे। किन्तु इन सभी बातों की पूर्णतः उपेक्षा की गयी। प्रा कुरुंदकर ने अपने अध्ययन के अन्त में स्पष्ट किया है कि, "सम्भाजी की भ्रष्टता का आरोप 1690 के बाद आरम्भ हुआ। श्री पगड़ी का भी यही मत है। इसका अर्थ यह है कि सम्भाजी के कठोर अनुशासन से जिन्हें कष्ट पहुँचा था अथवा जागीर न बाँटने की शिवाजी महाराज की नीति का सम्भाजी ने जिस कठोरता से 778 :. सम्भाजी