छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 774, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिवाजी और सम्भाजी राजा के विषय में चर्चा होने लगी। उनकी स्मृतियों से महिलाओं का कलेजा काँपने लगा। रात काफी बीत चुकी थी फिर भी वहाँ से हटने के लिए कोई तैयार नहीं था। मन्दिर के गोरखनाथ बाबा को पाटिलबाई ने अपने बाड़े पर बुलवा लिया। गोरखनाथ बाबा कुछ वर्ष पहले सज्जनगढ़ पर शम्भू महाराज से मिले थे। उसकी चर्चा करते हुए बाबा को स्मरण हुआ कि स्वराज्य के युवराज कितने साहसी और उदार थे। यह चर्चा करते-करते उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं। अन्य उपस्थित लोग भी भीतर ही भीतर हिल गये। इसी बीच इस पूरे प्रसंग से व्यथित गोविन्दा नाक वहाँ आ गया। अपनी लाठी को पेट पर टिकाते हुए वह कुछ दूरी पर बैठ गया। जना क्रोध से आगबबूला हो रही थी। वह गोरखनाथ बाबा से क्रोधावेश में पूछने लगी, "बाबा, मान लीजिए कोई बड़ा भूकम्प आ जाये तो उसमें पूरा गाँव नीचे धँस सकता है कि नहीं?" "सच है।" "जंगल में जब दावाग्नि लगती है तो वहाँ के गाँव जलकर खाक होते हैं कि नहीं?" "बिल्कुल होते हैं, बिटिया।" "तो मैं कहती हूँ कि हम ऐसे ही निकलकर चलें और शम्भू महाराज के रक्त मांस को इकट्ठा करके ले आयें, उनका दाह संस्कार करें। आखिर बादशाह करेगा भी तो क्या? गाँव को जला देगा, इतना ही न?" जना की बात सुनकर राधाबाई भी उठकर खड़ी हो गयीं। उनका भी खून उबल पड़ा। इसी बीच गोरखनाथ बाबा बोल पड़े, "अपनी परम्परा के अनुसार गाँव के आसपास यदि कोई लावारिस शव पड़ा हुआ मिले तो उसे उठाकर दाह संस्कार करना चाहिए, इस प्रकार मनुष्य शरीर को मुक्ति दी जाती है। शास्त्रों और पुराणों का भी ऐसा ही आदेश है।" और यहाँ शिवाजी महाराज के बेटे के शरीर के लोथड़े पड़े हैं। फिर भी हम सारे नामर्द चूड़ियाँ पहनकर चुप बैठे हैं।" दूर से गोविन्दा की आवाज आयी। उस एकत्र भीड़ में मानो क्रोध और दुख से प्रेरित नशा चढ़ गया। सारी अबलाएँ सबला बनकर खड़ी हो गयीं। क्रोध से वे आगबबूला हो रही थीं। "चलोऽऽ, नदी की ओर चलोऽऽ" चारों ओर से शोर उठा। ये महिलाएँ डंडे, लकड़ी, मूसल जो कुछ भी मिला वह लेकर जाने के लिए तैयार हो गयीं। बाहर घना अँधेरा था किन्तु सभी माताएँ और पुत्रियाँ आँचल कमर में खोंसकर अपने लक्ष्य के लिए तैयार हो गयीं। बाड़े के भीतर उठने वाला शोर दामाजी पाटिल के कानों में पड़ा। भीतर सोये 772 :: सम्भाजी