भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 सुन्दरी विलाप जिसकी खूबी, खूब सब, सोई खूब सँभार। दादू सुन्दरी खूब सौं, नखशिख साज सँवार ॥ 28 ॥ दादू पंच आभूषण पीव कर, सोलह सब ही ठांव। सुन्दरी यहु श्रृंगार करि, ले ले पीव का नांव ॥ 29 ॥ यहु व्रत सुन्दरी ले रहै, तो सदा सुहागिनी होइ। दादू भावै पीव कौं, ता सम और न कोइ ॥ 30 ॥ पतिव्रता निष्काम साहिब जी का भावता, कोई करै कलि मांहि। मनसा वाचा कर्मना, दादू घटि घटि नांहि ॥ 31 ॥ आज्ञा मांहीं बैसै ऊठै, आज्ञा आवै जाइ। आज्ञा मांहीं लेवै देवै, आज्ञा पहरै खाइ ॥ 32 ॥ आज्ञा मांही बाहर भीतर, आज्ञा रहै समाइ। आज्ञा मांही तन मन राखै, दादू रहै ल्यौ लाइ ॥ 33 ॥ पतिव्रता गृह आपने, करै खसम की सेव। ज्यों राखै त्यों ही रहै, आज्ञाकारी टेव ॥ 34 ॥ सुन्दरी विलाप दादू नीच ऊँच कुल सुन्दरी, सेवा सारी होइ। सोई सुहागिन कीजिये, रूप न पीजे धोइ ॥ 35 ॥ दादू जब तन मन सौंप्या राम को, ता सन क्या व्यभिचार। सहज शील संतोष सत, प्रेम भक्ति लै सार ॥ 36 ॥ पर पुरुषा सब परहरै, सुन्दरी देखै जागि। अपणा पीव पिछाण करि, दादू रहिये लागि ॥ 37 ॥ आन पुरुष हूँ बहिनड़ी, परम पुरुष भरतार। हूँ अबला समझं नहीं, तूं जानै करतार ॥ 38 ॥

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