भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 पतिव्रत नारी सेवक तब लगै, जब लग सांई पास। दादू परसै आन को, ताकी कैसी आस ॥ 50 ॥ आन लगन व्यभिचार दादू नारी पुरुष को, जाने जे वश होइ। पीव की सेवा ना करै, कामणिगारी सोइ ॥ 51 ॥ करूणा कीया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार। क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भर्तार ॥ 52 ॥ आन लग्न व्यभिचार करामात कलंक है, जाकै हिरदै एक। अति आनन्द व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥ 53 ॥ दादू पतिव्रता के एक है, व्यभिचारिणी के दोइ। पतिव्रता व्यभिचारिणी, मेला क्यों कर होइ ॥ 54 ॥ पतिव्रता के एक है, दूजा नांही आन। व्यभिचारिणी के दोइ हैं, पर घर एक समान ॥ 55 ॥ सुन्दरी सुहाग दादू पुरुष हमारा एक है, हम नारी बहु अंग। जे जे जैसी ताहि सौं, खेलैं तिस हि रंग ॥ 56 ॥ पतिव्रत दादू रहता राखिये, बहता देइ बहाइ। बहते संग न जाइये, रहते सौं ल्यौ लाइ ॥ 57 ॥ जनि बाझैं काहू कर्म सौं, दूजै आरंभ जाइ। दादू ऐकै मूल गहि, दूजा देइ बहाइ ॥ 58 ॥ बावें देखि न दाहिने, तन मन सन्मुख राखि। दादू निर्मल तत्त्व गह, सत्य शब्द यहु साखि ॥ 59 ॥ दादू दूजा नैन न देखिये, श्रवणहुँ सुने न जाइ। जिह्या आन न बोलिये, अंग न और सुहाइ ॥ 60 ॥

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