भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 चरणहुँ अनत न जाइये, सब उलटा मांहि समाइ । उलट अपूठा आप में, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 61 ॥ दादू दूजे अंतर होत है, जनि आने मन मांहि । तहाँ ले मन को राखिये, जहँ कुछ दूजा नांहि ॥ 62 ॥ भ्रम विध्वंस भ्रम तिमिर भाजै नहीं, रे जिय आन उपाइ । दादू दीपक साज ले, सहजैं ही मिट जाइ ॥ 63 ॥ दादू सो वेदन नहीं बावरे, आन किये जे जाइ । सब दुख भंजन सांइयाँ, ताहि सौं ल्यौ लाइ ॥ 64 ॥ दादू औषध मूली कुछ नहीं, ये सब झूठी बात । जे औषध ही जीविये, तो काहे को मर जात ॥ 65 ॥ पतिव्रत मूल गहै सो निश्चल बैठा, सुख में रहै समाइ । डाल पान भ्रमत फिरै, वेदों दिया बहाइ ॥ 66 ॥ सो धक्का सुनहाँ को देवै, घर बाहर काढै । दादू सेवक राम का, दरबार न छाड़े ॥ 67 ॥ साहिब का दर छाड़ि कर, सेवक कहीं न जाय । दादू बैठा मूल गह, डालों फिरै बलाय ॥ 68 ॥ दादू जब लग मूल न सींचिये, तब लग हरा न होइ । सेवा निष्फल सब गई, फिर पछताना सोइ ॥ 69 ॥ दादू सींचे मूल के, सब सींच्या विस्तार । दादू सींचे मूल बिन, बाद गई बेगार ॥ 70 ॥ सब आया उस एक में, डाल पान फल फूल । दादू पीछे क्या रह्या, जब निज पकड़या मूल ॥ 71 ॥ खेत न निपजै बीज बिन, जल सींचे क्या होइ । सब निष्फल दादू राम बिन, जानत है सब कोइ ॥ 72 ॥

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