सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 दादू जब मुख मांहि मेलिये, तब सब ही तृप्ता होइ। मुख बिन मेले आन दिश, तृप्ति न माने कोइ ॥ 73 ॥ जब देव निरंजन पूजिये, तब सब आया उस मांहि। डाल पान फल फूल सब, दादू न्यारे नांहि ॥ 74 ॥ दादू टीका राम को, दूसर दीजे नांहि। ज्ञान ध्यान तप भेष पक्ष, सब आये उस मांहि ॥ 75 ॥ साधू राखै राम को, संसारी माया। संसारी पल्लव गहै, मूल साधू पाया ॥ 76 ॥ आन लगन व्यभिचार दादू जे कुछ कीजिये, अविगत बिन आराध। कहबा सुनबा देखबा, करबा सब अपराध ॥ 77 ॥ सब चतुराई देखिए, जे कुछ कीजै आन। दादू आपा सौंपि सब, पीव को लेहु पिछान ॥ 78 ॥ पतिव्रत दादू दूजा कुछ नहीं, एक सत्य कर जान। दादू दूजा क्या करै, जिन एक लिया पहचान ॥ 79 ॥ दादू कोई वांछै मुक्ति फल, कोइ अमरापुर वास। कोई वांछै परमगति, दादू राम मिलन की प्यास ॥ 80 ॥ तुम हरि हिरदै हेत सौं, प्रगटहु परमानन्द। दादू देखै नैन भर, तब केता होइ आनन्द ॥ 81 ॥ प्रेम पियाला राम रस, हमको भावै येहि। रिधि सिधि मांगैं मुक्ति फल, चाहें तिनको देहि ॥ 82 ॥ कोटि वर्ष क्या जीवना, अमर भये क्या होइ। प्रेम भक्ति रस राम बिन, का दादू जीवन सोइ ॥ 83 ॥ कछू न कीजे कामना, सगुण निर्गुण होहि। पलट जीव तैं ब्रह्म गति, सब मिलि मानैं मोहि ॥ 84 ॥
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