भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 घट अजरावर ह्वै रहै, बन्धन नांही कोइ । मुक्ता चौरासी मिटै, दादू संशय सोइ ॥ 85 ॥ लाँबि रस निकटि निरंजन लाग रहु, जब लग अलख अभेव । दादू पीवै राम रस, निहकामी निज सेव ॥ 86 ॥ परिचय पतिव्रत सालोःय संगति रहै, सामीप्य सन्मुख सोइ । सारूप्य सारीखा भया, सायुज्य एकै होइ ॥ 87 ॥ राम रसिक वांछै नहीं, परम पदारथ चार । अठसिधि नव निधि का करै, राता सिरजनहार ॥ 88 ॥ आन लग्न व्यभिचार स्वारथ सेवा कीजिये, ताथैं भला न होइ । दादू ऊसर बाहि कर, कोठा भरै न कोइ ॥ 89 ॥ सुत वित मांगैं बावरे, साहिब सी निधि मेलि । दादू वे निष्फल गये, जैसे नागर बेलि ॥ 90 ॥ फल कारण सेवा करै, जाचै त्रिभुवन राव । दादू सो सेवक नहीं, खेलै अपना दाव ॥ 91 ॥ सहकामी सेवा करैं, मागैं मुग्ध गँवार । दादू ऐसे बहुत हैं, फल के भूँचनहार ॥ 92 ॥ स्मरण नाम महात्म तन मन लै लागा रहै, राता सिरजनहार । दादू कुछ मांगैं नहीं, ते बिरला संसार ॥ 93 ॥ दादू सांई को संभालतां, कोटि विघ्न टल जांहि । राई मन बैसंधरा, केते काठ जलांहि ॥ 94 ॥

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