सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-माया का अंग 12 दादू कहै, जे हम छाड़े हाथ थैं, सो तुम लिया पसार । जे हम लेवैं प्रीति सौं, सो तुम दिया डार ॥ 91 ॥ दादू हीरा पग सौं ठेलि कर, कंकर को कर लीन्ह । पारब्रह्म को छाड़ कर, जीवन सौं हित कीन्ह ॥ 92 ॥ दादू सबको बणिजै खार खल, हीरा कोई न लेय । हीरा लेगा जौहरी, जो माँगे सो देय ॥ 93 ॥ दड़ी दोट ज्यों मारिये, तिहुँ लोक में फे र । धुरि पहुँचे संतोंष है, दादू चढिबा मेर ॥ 94 ॥ अनिल पंखी आकाश को, माया मेरु उलंघ । दादू उलटे पंथ चढ, जाइ बिलंबे अंग ॥ 95 ॥ दादू माया आगे जीव सब, ठाढे रहे कर जोड़ । जिन सिरजे जल बूँद सौं, तासों बैठे तोड़ ॥ 96 ॥ सुर नर मुनिवर वश किये, ब्रह्मा विष्णु महेश । सकल लोक के सिर खड़ी, साधु के पग हेठ ॥ 97 ॥ दादू माया चेरी संत की, दासी उस दरबार । ठकुराणी सब जगत की, तीनों लोक मंझार ॥ 98 ॥ दादू माया दासी संत की, शाकत की सिरताज । शाकत सेती भांडणी, संतों सेती लाज ॥ 99 ॥ चार पदार्थ मुक्ति बापुरी, अठ सिधि नव निधि चेरी । माया दासी ताकेआगे, जहाँ भक्ति निरंजन तेरी ॥ 100 ॥ दादू कहै, माया चेरी साधुहि सेवै । साधुन कबहूँ आदर देवै ॥ ज्यों आवै, त्यों जाइ बिचारी । विलसी, वितड़ी, न माथै मारी ॥ 101 ॥ दादू माया सब गहले किये, चौरासी लख जीव । ताका चेरी क्या करै, जे रंग राते पीव ॥ 102 ॥
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