सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-माया का अंग 12 विरक्तता दादू माया बैरिण जीव की, जनि कोइ लावे प्रीति । माया देखे नरक कर, यह संतन की रीति ॥ 103 ॥ माया माया मति चकचाल कर, चंचल कीये जीव । माया माते मद पिया, दादू बिसऱ्या पीव ॥ 104 ॥ आन लग्न व्यभिचार जने जने की राम की, घर घर की नारी । पतिव्रता नहीं पीव की, सो माथै मारी ॥ 105 ॥ जन जन के उठ पीछे लागै, घर घर भ्रमत डोलै । ताथैं दादू खाइ तमाचे, माँदल दुहुँ मुख बोलै ॥ 106 ॥ विषय विरक्तता जे नर कामिनी परहरैं,ते छूटैं गर्भवास । दादू ऊँधे मुख नहीं, रहैं निरंजन पास ॥ 107 ॥ रोक न राखै, झूठ न भाखै, दादू खरचै खाइ । नदी पूर प्रवाह ज्यों, माया आवै जाइ ॥ 108 ॥ सदका सिरजनहार का, केता आवै जाइ । दादू धन संचय नहीं, बैठा खुलावै खाइ ॥ 109 ॥ माया जोगिनी ह्वै जोगी गहै, सूफिनी ह्वै कर शेख । भक्तिनी ह्वै भक्ता गहै, कर कर नाना भेख ॥ 110 ॥ बुद्धि विवेक बल हरणी, त्रय तन ताप उपावनी । अंग अगनि प्रजालिनी, जीव घरबार नचावनी ॥ 111 ॥ नाना विधि के रूप धर, सब बांधे भामिनी । जग बिटंब परलै किया, हरि नाम भुलावनी ॥ 112 ॥
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