सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-माया का अंग 12 बाजीगर की पूतली, ज्यौं मर्कट मोह्या। दादू माया राम की, सब जगत बिगोया ॥ 113 ॥ शिश्न स्वाद मोरा मोरी देखकर, नाचै पंख पसार। यों दादू घर आंगणै, हम नाचे कै बार ॥ 114 ॥ पुरुष प्रकाशक दादू जिस घट दीपक राम का, तिस घट तिमिर न होइ। उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥ 115 ॥ माया दादू जेहि घट ब्रह्म न प्रकटै, तहँ माया मंगल गाइ। दादू जागै ज्योति जब, तब माया भ्रम विलाइ ॥ 116 ॥ पति पहचान दादू जोति चमकै तिरवरे, दीपक देखै लोइ। चन्द सूर का चान्दणा, पगार छलावा होइ ॥ 117 ॥ माया दादू दीपक देह का, माया प्रगट होइ। चौरासी लख पंखिया, तहाँ परै सब कोइ ॥ 118 ॥ पुरुष प्रकाशक दादू यहु घट दीपक साध का, ब्रह्म ज्योति प्रकाश। दादू पंखी संतजन, तहाँ परैं निज दास ॥ 119 ॥ विषय विरक्तता दादू मन मृतक भया, इंद्री अपणै हाथ। तो भी कदे न कीजिये, कनक कामिनी साथ ॥ 120 ॥ जानै बूझै जीव सब, त्रिया पुरुष का अंग। आपा पर भूला नहीं, दादू कैसा संग ॥ 121 ॥ माया के घट साजि द्वै, त्रिया पुरुष धरि नांव। दोन्यूं सुन्दर खेलैं दादू, राखि लेहु बलि जांव ॥ 122 ॥
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