सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-माया का अंग 12 बहिन बीर सब देखिये, नारी अरु भरतार । परमेश्वर के पेट का, दादू सब परिवार ॥ 123 ॥ पर घर परिहर आपणी, सब एकै उणहार । पसु प्राणी समझै नहीं, दादू मुग्ध गँवार ॥ 124 ॥ पुरुष पलट बेटा भया, नारी माता होहि । दादू को समझै नहीं, बड़ा अचंभा मोहि ॥ 125 ॥ माता नारी पुरुष की, पुरुष नारी का पूत । दादू ज्ञान विचार कर, छाड़ गये अवधूत ॥ 126 ॥ अध्यात्म दादू माया का जल पीवतां, व्याधि होइ विकार । सेझे का जल निर्मला, प्राण सुखी सुध सार ॥ 127 ॥ जीव गहिला जीव बावला, जीव दीवाना होइ । दादू अमृत छाड़ कर, विष पीवै सब कोइ ॥ 128 ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश लौं, सुर नर उरझाया । विष का अमृत नाम धर, सब किनहूँ खाया ॥ 129 ॥ माया माया मैली गुणमयी, धर धर उज्ज्वल नांम । दादू मोहे सबनि को, सुर नर सब ही ठांम ॥ 130 ॥ विषय अतृप्ति विष का अमृत नांव धर, सब कोई खावै । दादू खारा ना कहै, यहु अचरज आवै ॥ 131 ॥ दादू जे विष जारे खाइ कर, जनि मुख में मेलै । आदि अन्त परलै गये, जे विष सौं खेलै ॥ 132 ॥ जिन विष खाया ते मुये, क्या मेरा तेरा । आग पराई आपणी, सब करै निबेरा ॥ 133 ॥
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