सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 158, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-माया का अंग 12 अपना पराया खाइ विष, देखत ही मर जाय। दादू को जीवै नहीं, इहि भोरे जनि खाय ॥ 134 ॥ दादू कहै, जनि विष पीवै बावरे, दिन दिन बाढै रोग। देखत ही मर जाइगा, तजि विषिया रस भोग ॥ 135 ॥ माया ब्रह्म सरीखा होइ कर, माया सौं खेलै। दादू दिन दिन देखतां, अपने गुण मेलै ॥ 136 ॥ माया मारै लात सौ, हरि को घालै हाथ। संग तजै सब झूठ का, गहै सच का साथ ॥ 137 ॥ घर के मारे वन के मारे, मारे स्वर्ग पयाल। सूक्ष्म मोटा गूंथकर, माँड्या माया जाल ॥ 138 ॥ दादू ऊभा सारं, बैठा विचारं, संभारं जागत सूता। तीन लोक तत जाल विडारण, तहाँ जाइगा पूता ॥139॥ मूये सरीखे है रहे, जीवन की क्या आस। दादू राम विसार कर, बांछे भोग विलास ॥ 140 ॥ कृत्रिम कर्ता माया रूपी राम को, सब कोई ध्यावै। अलख आदि अनादि है, सो दादू गावै ॥ 141 ॥ ब्रह्मा का वेद, विष्णु की मूर्ति, पूजे सब संसारा। महादेव की सेवा लागे, कहाँ है सिरजनहारा ॥ 142 ॥ माया का ठाकुर किया, माया की महामाइ। ऐसे देव अनंत कर, सब जग पूजन जाइ ॥ 143 ॥ माया बैठी राम है, कहै मैं ही मोहन राइ। ब्रह्मा विष्णु महेश लौं, जोनी आवै जाइ ॥ 144 ॥ माया बैठी राम है, ताको लखै न कोइ। सब जग मानै सत्य कर, बड़ा अचंभा मोहि ॥ 145 ॥
- 158 -