भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12 अंजन किया निरंजना, गुण निर्गुण जानें। धरा दिखावैं अधर कर, कैसे मन मानैं ॥ 146 ॥ निरंजन की बात कहै, आवै अंजन माँहि। दादू मन मानै नहीं, स्वर्ग रसातल जांहि ॥ 147 ॥ कामधेनु कै पटंतरे, करै काठ की गाइ। दादू दूध दूझै नहीं, मूरख देइ बहाइ ॥ 148 ॥ चिंतामणि कंकर किया, माँगे कुछ न देइ। दादू कंकर डारदे, चिंतामणि कर लेइ ॥ 149 ॥ पारस किया पाषाण का, कंचन कदे न होइ। दादू आत्माराम बिन, भूल पड़या सब कोइ ॥ 150 ॥ सूरज फटिक पाषाण का, तासौं तिमिर न जाइ। साचा सूरज परगटै, दादू तिमिर नशाइ ॥ 151 ॥ मूर्ति घड़ी पाषाण की, किया सिरजनहार। दादू साच सूझै नहीं, यों डूबा संसार ॥ 152 ॥ पुरुष विदेश कामिनी किया, उसही के उणिहार। कारज को सीझै नहीं, दादू माथे मार ॥ 153 ॥ कागद का मानुष किया, छत्रपति सिरमौर। राजपाट साधै नहीं, दादू परिहर और ॥ 154 ॥ सकल भुवन भानै घड़ै, चतुर चलावनहार। दादू सो सूझै नहीं, जिसका वार न पार ॥ 155 ॥ कर्ता साक्षीभूत दादू पहली आप उपाइ कर, न्यारा पद निर्वाण। ब्रह्मा विष्णु महेश मिल, बाँध्या सकल बंधाण ॥ 156 ॥ कृत्रिम कर्ता नाम नीति अनीति सब, पहली बाँधे बंध। पशु न जाणै पारधी, दादू रोपे फंध ॥ 157 ॥

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