सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 कुफ्र जे के मन में, मीयां मुसलमान । दादू पेया झंग में, बिसारे रहमान ॥ 16 ॥ आपस को मारै नहीं, पर को मारन जाइ । दादू आपा मारे बिना, कैसे मिले खुदाइ ॥ 17 ॥ दादू भीतर द्वन्दर भर रहे, तिनको मारैं नांहि । साहिब की अरवाह को, ताको मारन जांहि ॥ 18 ॥ दादू मूये को क्या मारिये, मीयां मूई मार । आपस को मारै नहीं, औरों को हुसियार ॥ 19 ॥ सांच जिसका था तिसका हुआ, तो काहे का दोष । दादू बंदा बंदगी, मीयां ना कर रोष ॥ 20 ॥ सेवक सिरजनहार का, साहिब का बंदा । दादू सेवा बंदगी, दूजा क्या धंधा ॥ 21 ॥ सो काफिर जे बोलै काफ, दिल अपना नहीं राखै साफ। सांई को पहचानै नांहीं, कूड़ कपट सब उन्हींमांहीं ॥ 22 ॥ साँई का फरमान न मानैं, कहाँ पीव ऐसै कर जानैं । मन अपणे में समझत नांहीं, निरखत चलैं अपनी छांहीं ॥ 23 ॥ जोर करै मसकीन सतावै, दिल उसके में दर्द न आवै । सांई सेती नांही नेह, गर्व करै अति अपनी देह ॥ 24 ॥ इन बातन क्यों पावै पीव, पर धन ऊपर राखै जीव । जोर जुल्म कर कुटुम्ब सौं खाइ, सो काफिर दोजख में जाइ ॥ 25 ॥ अदया-हिंसा दादू जाको मारन जाइये, सोई फिर मारै । जाको तारन जाइये, सोई फिर तारै ॥ 26 ॥
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