भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 दादू खाटा मीठा खाइ करि, स्वादैं चित दीया । इन में जीव विलंबिया, हरि नाम न लीया ॥ 61 ॥ भक्ति न जाणै राम की, इन्द्री के आधीन । दादू बँध्या स्वाद सौं, ताथैं नाम न लीन ॥ 62 ॥ सांच दादू अपना नीका राखिये, मैं मेरा दिया बहाइ । तुझ अपने सेती काज है, मैं मेरा भावै तीधर जाइ ॥ 63 ॥ जे हम जाण्या एक कर, तो काहे लोक रिसाइ । मेरा था सो मैं लिया, लोगों का क्या जाइ ॥ 64 ॥ करणी बिना कथनी दादू द्वै द्वै पद किये, साखी भी द्वै चार । हमको अनुभव ऊपजी, हम ज्ञानी संसार ॥ 65 ॥ सुन सुन पर्चै ज्ञान के, साखी शब्द्दी होइ । तब ही आपा ऊपजै, हम-सा और न कोइ ॥ 66 ॥ सो उपज किस काम की, जे जण जण करै क्लेश । साखी सुन समझै साधु की, ज्यों रसना रस शेष ॥ 67 ॥ दादू पद जोड़ै साखी कहै, विषय न छाड़ै जीव । पानी घालि बिलोइये तो, क्यों करि निकसै घीव ॥ 68 ॥ दादू पद जोड़े का पाइये, साखी कहे का होइ । सत्य शिरोमणि सांइयां, तत्त न चीन्हा सोइ ॥ 69 ॥ कहबा सुनबा मन खुशी, करबा औरै खेल । बातों तिमिर न भाजई, दीवा बाती तेल ॥ 70 ॥ दादू करबे वाले हम नहीं, कहबे को हम शूर । कहबा हम थैं निकट है, करबा हम थैं दूर ॥ 71 ॥ कहे कहे का होत है, कहे न सीझै काम । कहे कहे का पाइये, जब लग हृदै न आवै राम ॥ 72 ॥

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