भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 चौंप चरचा दादू श्रोता घर नहीं, वक्ता बकै सु बादि । वक्ता श्रोता एक रस, कथा कहावै आदि ॥ 73 ॥ वक्ता श्रोता घर नहीं, कहै सुनै को राम । दादू यहु मन थिर नहीं, बाद बकै बेकाम ॥ 74 ॥ विचार दृढ़ ज्ञान अन्तर सुरझे समझ कर, फिर न अरूझे जाइ । बाहर सुरझे देखतां, बहुरि अरूझे आइ ॥ 75 ॥ झूठै गुरु आतम लावै आप सौं, साहिब सेती नांहि । दादू को निपजै नहीं, दोन्यूं निष्फल जांहि ॥ 76 ॥ तू मुझ को मोटा कहै, हौं तुझ बड़ाई मान । सांई को समझै नहीं, दादू झूठा ज्ञान ॥ 77 ॥ कस्तूरिया मृग सदा समीप रहै संग सन्मुख, दादू लखै न गूझ । सपने ही समझै नहीं, क्यों कर लहै अबूझ ॥ 78 ॥ बेखर्च व्यसनी दादू सेवक नाम बुलाइये, सेवा सपनैं नांहिं । नाम धराये का भया, जे एक नहीं मन माहिं ॥ 79 ॥ नाम धरावै दास का, दासातन थैं दूर । दादू कारज क्यों सरै, हरि सौं नहीं हजूर ॥ 80 ॥ भक्त न होवै भक्ति बिन, दासातन बिन दास । बिन सेवा सेवक नहीं, दादू झूठी आस ॥ 81 ॥ राम भक्ति भावै नहीं, अपनी भक्ति का भाव । राम भक्ति मुख सौं कहै, खेलै अपना डाव ॥ 82 ॥

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