सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 भक्ति निराली रह गई, हम भूल पड़े वन माहिं। भक्ति निरंजन राम की, दादू पावै नांहिं ॥ 83 ॥ सो दशा कतहूँ रही, जिहि दिशि पहुंचै साध। मैं तैं मूरख गह रहे, लोभ बड़ाई बाद ॥ 84 ॥ दादू राम विसार कर, कीये बहु अपराध। लाजों मारे संत सब, नांव हमारा साध ॥ 85 ॥ करणी बिना कथनी मनसा के पकवान सौं, क्यों पेट भरावै। ज्यों कहिये त्यों कीजिये, तब ही बन आवै ॥ 86 ॥ दादू मिश्री मिश्री कीजिये, मुख मीठा नाहीं। मीठा तब ही होइगा, छिटकावै माहीं ॥ 87 ॥ दादू बातों ही पहुंचै नहीं, घर दूर पयाना। मारग पन्थी उठि चलै, दादू सोई सयाना ॥ 88 ॥ बातों सब कुछ कीजिये, अंत कछू नहिं देखै। मनसा वाचा कर्मना, तब लागै लेखै ॥ 89 ॥ समझ सुजानता दादू कासौँ कहि समझाइये, सब कोई चतुर सुजान। कीड़ी कुंजर आदि दे, नाहिंन कोई अजान ॥ 90 ॥ करणी बिना कथनी शूकर स्वान सियाल सिंह, सर्प रहैं घट माँहि। कुंजर कीड़ी जीव सब, पांडे जाणैं नाहिं ॥ 91 ॥ दादू सूना घट सोधी नहीं, पंडित ब्रह्मा पूत। आगम निगम सब कथैं, घर में नाचै भूत ॥ 92 ॥ पढे न पावै परमगति, पढे न लंघै पार। पढे न पहुंचै प्राणियां, दादू पीड़ पुकार ॥ 93 ॥
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