सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-विचार का अंग 18 सांच जब दर्पण मांहि देखिये, तब अपना सूझै आप। दर्पण बिन सूझै नहीं, दादू पुन्य रु पाप ॥ 4 ॥ ज्ञान परिचय जीयें तेल तिलनि में, जीयें गंध फूलनि। जीयें माखणु खीर में, ईयें रब्ब रूहनि ॥ 5 ॥ ईयें रब्ब रूहनि में, जीयें रूह रगनि। जीयें जेरो सूर मां, ठंडो चन्द्र बसंनि ॥ 6 ॥ दादू जिन यहु दिल मंदिर किया, दिल मंदिर में सोइ। दिल मांही दिलदार है, और न दूजा कोइ ॥ 7 ॥ मीत तुम्हारा तुम्ह कनै, तुम ही लेहु पिछान। दादू दूर न देखिये, प्रतिबिम्ब ज्यों जान ॥ 8 ॥ विरक्तता दादू नाल कमल जल ऊपजै, क्यों जुदा जल मांहि? चंद हि हित चित प्रीतड़ी, यो जल सेती नांहि ॥ 9 ॥ दादू एक विचार सौं, सब तैं न्यारा होइ। मांहि है पर मन नहीं, सहज निरंजन सोइ ॥ 10 ॥ दादू गुण निर्गुण मन मिल रह्या, क्यों बेगर ह्वै जाहि। जहँ मन नांही सो नहीं, जहाँ मन चेतन सो आहि ॥ 11 ॥ विचार दादू सबही व्याधि की, औषधि एक विचार। समझे तैं सुख पाइये, कोइ कुछ कहो गँवार ॥ 12 ॥ दादू इक निर्गुण इक गुणमयी, सब घट ये द्वै ज्ञान। काया का माया मिले, आतम ब्रह्म समान ॥ 13 ॥ दादू कोटि अचारिन एक विचारी, तऊ न सरभर होइ। आचारी सब जग भव्या, विचारी विरला कोइ ॥ 14 ॥
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