भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 504 में से

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पृष्ठ 210

श्री दादूवाणी-विचार का अंग 18

दादू घट में सुख आनन्द है, तब सब ठाहर होइ । घट में सुख आनन्द बिन, सुखी न देख्या कोइ ॥ 15 ॥ विरक्तता काया लोक अनन्त सब, घट में भारी भीर । जहाँ जाइ तहाँ संग सब, दरिया पैली तीर ॥ 16 ॥ काया माया ह्वै रही, जोधा बहु बलवंत । दादू दुस्तर क्यों तिरै, काया लोक अनंत ॥ 17 ॥ मोटी माया तज गये, सूक्ष्म लिये जाइ । दादू को छूटै नहीं, माया बड़ी बलाइ ॥ 18 ॥ दादू सूक्ष्म मांहिले, तिनका कीजे त्याग । सब तज राता राम सौं, दादू यहु वैराग ॥ 19 ॥ गुणातीत सो दर्शनी, आपा धरै उठाइ । दादू निर्गुण राम गहि, डोरी लागा जाइ ॥ 20 ॥ पिंड मुक्ति सब को करै, प्राण मुक्ति नहीं होइ । प्राण मुक्ति सतगुरु करै, दादू विरला कोइ ॥ 21 ॥ शिष्य जिज्ञासा दादू क्षुधा तृषा क्यों भूलिये, शीत तम क्यों जाइ ? क्यों सब छूटैं देह गुण ? सतगुरु कहि समझाइ ॥ 22 ॥ उत्तर मांही थैं मन काढ कर, ले राखै निज ठौर । दादू भूलै देह गुण, बिसर जाइ सब और ॥ 23 ॥ नाम भुलावै देह गुण, जीव दशा सब जाइ । दादू छाड़ै नाम को, तो फिर लागै आइ ॥ 24 ॥ दादू दिन दिन राता राम सौं, दिन दिन अधिक स्नेह । दिन दिन पीवै रामरस, दिन दिन दर्पण देह ॥ 25 ॥

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