भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 236

श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 दीनता गरीबी गरीब गरीबी गह रह्या, मसकीनी मसकीन । दादू आपा मेट करि, होइ रह्या लै लीन ॥ 28 ॥ उभय असमाव मैं हूँ मेरी जब लगै, तब लग विलसै खाइ । मै नाहीं मेरी मिटै, तब दादू निकट न जाइ ॥ 29 ॥ दादू मना मनी सब ले रहे, मनी न मेटी जाइ । मना मनी जब मिट गई, तब ही मिले खुदाइ ॥ 30 ॥ दादू मैं मैं जाल दे, मेरे लागो आग । मैं मैं मेरा दूर कर, साहिब के संग लाग ॥ 31 ॥ दादू मैं नांहीं तब एक है, मैं आई तब दोइ । मैं तैं पड़दा मिटि गया, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥ 32 ॥ मनमुखी मान दादू खोई आपणी, लज्जा कुल की कार । मान बड़ाई पति गई, तब सन्मुख सिरजनहार ॥ 33 ॥ परचै करुणा बिनती नूर सरीखा कर लिया, बंदों का बंदा । दादू दूजा को नहीं, मुझ सरीखा गंदा ॥ 34 ॥ जीवत मृतक दादू सीख्यों प्रेम न पाइये, सीख्यों प्रीति न होइ । सीख्यों दरद न ऊपजै, जब लग आप न खोइ ॥ 35 ॥ कहबा सुनबा गत भया, आपा पर का नाश । दादू मैं तैं मिट गया, पूर्ण ब्रह्म प्रकाश ॥ 36 ॥ दादू सांई कारण मांस का, लोही पानी होइ । सूखे आटा अस्थि का, दादू पावै सोइ ॥ 37 ॥

  • 236 -