भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 दादू काल गिरासन का कहै, काल रहित कह सोइ। काल रहित सुमिरण सदा, बिना गिरासन होइ ॥ 5 ॥ दादू मरिये राम बिन, जीजे राम सँभाल। अमृत पीवै आत्मा, यों साधू बंचै काल ॥ 6 ॥ दादू यहु घट काचा जल भरा, बिनशत्त नाहीं बार। यहु घट फूटा जल गया, समझत नहीं गँवार ॥ 7 ॥ फूटी काया जाजरी, नव ठाहर काणी। तामें दादू क्यों रहै, जीव सरीषा पाणी ॥ 8 ॥ बाव भरी इस खाल का, झूठा गर्व गुमान। दादू विनशै देखतां, तिसका क्या अभिमान ॥ 9 ॥ दादू हम तो मूये मांहि हैं, जीवण का रू भरम। झूठे का क्या गर्वबा, पाया मुझे मरम ॥ 10 ॥ यहु वन हरिया देखकर, फूल्यो फिरै गँवार। दादू यहु मन मृगला, काल अहेड़ी लार ॥ 11 ॥ सब ही दीसैं काल मुख, आपा गह कर दीन्ह। विनशै घट आकार का, दादू जे कुछ कीन्ह ॥ 12 ॥ काल कीट तन काठ को, जरा जन्म को खाइ। दादू दिन दिन जीव की, आयु घटंती जाइ ॥ 13 ॥ काल गिरासे जीव को, पल पल श्वासैं श्वास। पग पग मांहि दिन घड़ी, दादू लखै न तास ॥ 14 ॥ पाव पलक की सुधि नहीं, श्वास शब्द क्या होइ। कर मुख मांहि मेलतां, दादू लखै न कोइ ॥ 15 ॥ दादू काया कारवीं, देखत ही चल जाइ। जब लग श्वास शरीर में, राम नाम ल्यौ लाइ ॥ 16 ॥

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