भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 दादू करह पलाण कर, को चेतन चढ जाइ। मिल साहिब दिन देखतां, सांझ पड़े जनि आइ ॥ 29 ॥ पंथ दुहेला दूर घर, संग न साथी कोइ। उस मारग हम जाहिंगे, दादू क्यों सुख सोइ ॥ 30 ॥ लंघण1 के लकु2 घणा, कपर3 चाट4 डीन्ह। अलह पांधी5 पंथ6 में, बिहंदा7 आहीन8 ॥ 31 ॥ काल चितावणी दादू हसतां रोतां पाहुणा, काहू छाड़ न जाइ। काल खड़ा सिर ऊपरै, आवणहारा आइ ॥ 32 ॥ दादू जोरा बैरी काल है, सो जीव न जानै। सब जग सूता नींदड़ी, इस तानै बानै ॥ 33 ॥ दादू करणी काल की, सब जग परलै होइ। राम विमुख सब मर गये, चेत न देखै कोइ ॥ 34 ॥ साहिब को सुमिरै नहीं, बहुत उठावै भार। दादू करणी काल की, सब परलै संसार ॥ 35 ॥ सूता काल जगाइ कर, सब पैसैं मुख मांहि। दादू अचरज देखिया, कोई चेतै नांहि ॥ 36 ॥ सब जीव बिसाहैं काल को, कर कर क ोटि उपाइ। साहिब को समझैं नहीं, यों परलै ह्वै जाइ ॥ 37 ॥ दादू कारण काल के, सकल संवारैं आप। मीच बिसाहैं मरण को, दादू शोक संताप ॥ 38 ॥ दादू अमृत छाड़ कर, विषय हलाहल खाइ। जीव बिसाहै काल को, मूढा मर मर जाइ ॥ 39 ॥ निर्मल नाम विसार कर, दादू जीव जंजाल। नहीं तहाँ तैं कर लिया, मनसा मांहीं काल ॥ 40 ॥

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