सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-काल का अंग 25 सब जग छेली, काल कसाई, कर्द लिये कंठ काटै । पंच तत्त्व की पंच पंसुरी, खंड-खंड कर बांटै ॥ 41 ॥ काल झाल में जग जलै, भाज न निकसै कोइ । दादू शरणैं साच के, अभय अमर पद होइ ॥ 42 ॥ सब जग सूता नींद भर, जागै नाहीं कोइ । आगे पीछे देखिये, प्रत्यक्ष परलै होइ ॥ 43 ॥ आसक्ति मोह ये सज्जन दुर्जन भये, अंत काल की बार । दादू इनमें को नहीं, विपति बटावनहार ॥ 44 ॥ संगी सज्जन आपणां, साथी सिरजनहार । दादू दूजा को नहीं, इहि कलि इहि संसार ॥ 45 ॥ काल चितावणी ये दिन बीते चल गये, वे दिन आये धाइ । राम नाम बिन जीव को, काल गरासै जाइ ॥ 46 ॥ जे उपज्या सो विनश है, जे दीसै सो जाइ । दादू निर्गुण राम जप, निश्चल चित्त लगाइ ॥ 47 ॥ जे उपज्या सो विनश है, कोई थिर न रहाइ । दादू बारी आपणी, जे दीसै सो जाइ ॥ 48 ॥ दादू सब जग मर मर जात है, अमर उपावणहार । रहता रमता राम है, बहता सब संसार ॥ 49 ॥ संजीवन दादू कोई थिर नहीं, यहु सब आवै जाइ । अमर पुरुष आपै रहै, कै साधु लयौ लाइ ॥ 50 ॥ काल चितावणी यहु जग जाता देखकर, दादू करी पुकार । घड़ी महूरत चालनां, राखै सिरजनहार ॥ 51 ॥
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