सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-काल का अंग 25 चंद, सूर, धर, पवन, जल, ब्रह्मांड खंड प्रवेश। सो काल डरै करतार तैं, जै जै तुम आदेश ॥ 87 ॥ पवना, पानी, धरती, अंबर, विनशै रवि, शशि, तारा। पंत तत्त्व सब माया विनशै, मानुष कहा विचारा ॥ 88 ॥ दादू विनशैं तेज के, माटी के किस मांहि। अमर उपावणहार है, दूजा कोई नांहि ॥ 89 ॥ प्राण पवन ज्यों पतला, काया करैं कमाइ। दादू सब संसार में, क्यों हि गह्या न जाइ ॥ 90 ॥ नूर तेज ज्यों जोति है, प्राण पिंड यों होइ। दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, साहिब के वश सोइ ॥ 91 ॥ स्वकीयमित्र शत्रुता मन ही मांही ह्वै मरै, जीवै मन ही मांहि। साहिब साक्षीभूत है, दादू दूषण नांहि ॥ 92 ॥ आपै मारै आपको, आप आप को खाइ। आपै अपना काल है, दादू कहि समझाइ ॥ 93 ॥ आपै मारै आपको, यहु जीव विचारा। साहिब राखणहारा है, सो हितू हमारा ॥ 94 ॥ अग्नि रूप पुरुष इक कहहिं, संगति देह सहज ही दहहिं। दीसे माणस प्रत्यक्ष काल, ज्यों कर त्यों कर दादू टाल ॥ 95 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य पच्चीसवां कलि का अंग सम्पूर्ण ।। अंग 25 ।। साखी 95 ।।
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