सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-काल का अंग 25 बहुत पसारा कर गया, कुछ हाथ न आया। दादू हरि की भक्ति बिन, प्राणी पछताया ॥ 75 ॥ माणस जल का बुदबुदा, पानी का पोटा। दादू काया कोट में, मैं वासी मोटा ॥ 76 ॥ बाहर गढ निर्भय करै, जीबे के तांहीं। दादू मांहीं काल है, सो जाणै नांहीं ॥ 77 ॥ चित्त कपटी दादू साचे मत साहिब मिलै, कपट मिलेगा काल। साचे परम पद पाइये, कपट काया में साल ॥ 78 ॥ काल चितावणी मन ही मांही मीच है, सारों के शिर साल। जे कुछ व्यापै राम बिन, दादू सोई काल ॥ 79 ॥ दादू जेती लहर विकार की, काल कँवल में सोइ। प्रेम लहर सो पीव की, भिन्न-भिन्न यों होइ ॥ 80 ॥ दादू काल रूप मांही बसै, कोई न जानै ताहि। यह कूड़ी करणी काल है, सब काहू को खाइ ॥ 81 ॥ दादू विष अमृत घट में बसैं, दोन्यों एकै ठाँव। माया विषय विकार सब, अमृत हरि का नाँव ॥ 82 ॥ दादू कहाँ मुहम्मद मीर था, सब नबियों सिरताज। सो भी मर माटी हुवा, अमर अलह का राज ॥ 83 ॥ केते मर मांटी भये, बहुत बड़े बलवन्त। दादू केते ह्वै गये, दाना देव अनन्त ॥ 84 ॥ दादू धरती करते एक डग, दरिया करते फाल। हाकों पर्वत फाड़ते, सो भी खाये काल ॥ 85 ॥ दादू सब जग कंपै काल तैं, ब्रह्मा विष्णु महेश। सुर नर मुनिजन लोक सब, स्वर्ग रसातल शेष ॥ 86 ॥
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