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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 बहुत पसारा कर गया, कुछ हाथ न आया। दादू हरि की भक्ति बिन, प्राणी पछताया ॥ 75 ॥ माणस जल का बुदबुदा, पानी का पोटा। दादू काया कोट में, मैं वासी मोटा ॥ 76 ॥ बाहर गढ निर्भय करै, जीबे के तांहीं। दादू मांहीं काल है, सो जाणै नांहीं ॥ 77 ॥ चित्त कपटी दादू साचे मत साहिब मिलै, कपट मिलेगा काल। साचे परम पद पाइये, कपट काया में साल ॥ 78 ॥ काल चितावणी मन ही मांही मीच है, सारों के शिर साल। जे कुछ व्यापै राम बिन, दादू सोई काल ॥ 79 ॥ दादू जेती लहर विकार की, काल कँवल में सोइ। प्रेम लहर सो पीव की, भिन्न-भिन्न यों होइ ॥ 80 ॥ दादू काल रूप मांही बसै, कोई न जानै ताहि। यह कूड़ी करणी काल है, सब काहू को खाइ ॥ 81 ॥ दादू विष अमृत घट में बसैं, दोन्यों एकै ठाँव। माया विषय विकार सब, अमृत हरि का नाँव ॥ 82 ॥ दादू कहाँ मुहम्मद मीर था, सब नबियों सिरताज। सो भी मर माटी हुवा, अमर अलह का राज ॥ 83 ॥ केते मर मांटी भये, बहुत बड़े बलवन्त। दादू केते ह्वै गये, दाना देव अनन्त ॥ 84 ॥ दादू धरती करते एक डग, दरिया करते फाल। हाकों पर्वत फाड़ते, सो भी खाये काल ॥ 85 ॥ दादू सब जग कंपै काल तैं, ब्रह्मा विष्णु महेश। सुर नर मुनिजन लोक सब, स्वर्ग रसातल शेष ॥ 86 ॥

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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 चंद, सूर, धर, पवन, जल, ब्रह्मांड खंड प्रवेश। सो काल डरै करतार तैं, जै जै तुम आदेश ॥ 87 ॥ पवना, पानी, धरती, अंबर, विनशै रवि, शशि, तारा। पंत तत्त्व सब माया विनशै, मानुष कहा विचारा ॥ 88 ॥ दादू विनशैं तेज के, माटी के किस मांहि। अमर उपावणहार है, दूजा कोई नांहि ॥ 89 ॥ प्राण पवन ज्यों पतला, काया करैं कमाइ। दादू सब संसार में, क्यों हि गह्या न जाइ ॥ 90 ॥ नूर तेज ज्यों जोति है, प्राण पिंड यों होइ। दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, साहिब के वश सोइ ॥ 91 ॥ स्वकीयमित्र शत्रुता मन ही मांही ह्वै मरै, जीवै मन ही मांहि। साहिब साक्षीभूत है, दादू दूषण नांहि ॥ 92 ॥ आपै मारै आपको, आप आप को खाइ। आपै अपना काल है, दादू कहि समझाइ ॥ 93 ॥ आपै मारै आपको, यहु जीव विचारा। साहिब राखणहारा है, सो हितू हमारा ॥ 94 ॥ अग्नि रूप पुरुष इक कहहिं, संगति देह सहज ही दहहिं। दीसे माणस प्रत्यक्ष काल, ज्यों कर त्यों कर दादू टाल ॥ 95 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य पच्चीसवां कलि का अंग सम्पूर्ण ।। अंग 25 ।। साखी 95 ।।

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सजीवन का अंग www.dadooram.org अथ सजीवन का अंग २६ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ 1 ॥ दादू जे तूं जोगी गुरुमुखी, तो लेना तत्त्व विचार । गह आयुध गुरु ज्ञान का, काल पुरुष को मार ॥ 2 ॥ नाद बिंदु सौं घट भरै, सो जोगी जीवै । दादू काहे को मरै, राम रस पीवै ॥ 3 ॥ साधु जन की वासना, शब्द रहै संसार । दादू आतम ले मिलै, अमर उपावनहार ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26 राम सरीखे ह्वै रहें, यहु नांही उनहार । दादू साधू अमर हैं, विनशै सब संसार ॥ 5 ॥ जे कोई सेवे राम को, तो राम सरीखा होइ । दादू नाम कबीर ज्यों, साखी बोलै सोइ ॥ 6 ॥ अर्थ न आया सो गया, आया सो क्यों जाइ । दादू तन मन जीवतां, आपा ठौर लगाइ ॥ 7 ॥ जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव । उलट समाने आप में, अन्तर नांही पीव ॥ 8 ॥ दया विनती दादू कहै-सब रंग तेरे तैं रंगे, तूं ही सब रंग मांहि । सब रंग तेरे तैं किये, दूजा कोई नांहि ॥ 9 ॥ सजीवन काटै फन्द तो छूटै द्वन्द, छूटै द्वन्द तौ लागै बंद । लागै बन्द तो अमर कंद, अमर कंद दादू आनन्द ॥ 10 ॥ प्रश्न कहँ जम जोरा भंजिये, कहाँ काल कौ दंड । कहाँ मीच को मारिये, कहाँ जरा सत खंड ॥ 11 ॥ अमर ठौर अविनाशी आसन, तहाँ निरंजन लाग रहे । दादू जोगी जुग जुग जीवै, काल ब्याल सब सहज गये ॥ 12 ॥ रोम रोम लै लाइ धुनि, ऐसे सदा अखंड । दादू अविनाशी मिले, तो जम को दीजे दंड ॥ 13 ॥ दादू जरा काल जामण मरण, जहाँ जहाँ जीव जाइ । भक्ति परायण लीन मन, ताको काल न खाइ ॥ 14 ॥ मरणा भागा मरण तैं, दुःखैं नाठा दुःख । दादू भय सौं भय गया, सुःखैं छूटा सुःख ॥ 15 ॥

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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26 जीवन मरण जीवित मिले सो जीवते, मूये मिल मर जाइ । दादू दोन्यों देखकर, जहाँ जानैं तहँ लाइ ॥ 16 ॥ सजीवन दादू साधन सब किया, जब उनमन लागा मन । दादू सुस्थिर आत्मा, यों जुग जुग जीवैं जन ॥ 17 ॥ रहते सेती लाग रहु, तो अजरावर होइ । दादू देख विचार कर, जुदा न जीवै कोइ ॥ 18 ॥ जेती करणी काल की, तेती परिहर प्राण । दादू आतमराम सौं, जे तूं खरा सुजाण ॥ 19 ॥ विष अमृत घट में बसै, विरला जानै कोइ । जिन विष खाया ते मुये, अमर अमी सौं होइ ॥ 20 ॥ दादू सब ही मर रहे, जीवै नांही कोइ । सोई कहिये जीवता, जे कलि अजरावर होइ ॥ 21 ॥ देह रहै संसार में, जीव राम के पास । दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥ 22 ॥ काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि । दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥ 23 ॥ दादू तज संसार सब, रहे निराला होइ । अविनाशी के आसरे, काल न लागे कोइ ॥ 24 ॥ जागहु लागहु राम सौं, रैन बिहानी जाइ । सुमिर सनेही आपणा, दादू काल न खाइ ॥ 25 ॥ दादू जागहु लागहु राम सौं, छाड़हु विषय विकार । जीवहु पीवहु राम रस, आतम साधन सार ॥ 26 ॥ मरै तो पावै पीव को, जीवत बंचै काल । दादू निर्भय नाम ले, दोनों हाथ दयाल ॥ 27 ॥

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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26 दादू मरणे को चला, सजीवन के साथ । दादू लाहा मूल सौं, दोनों आये हाथ ॥ 28 ॥ करुणा दादू जाता देखिये, लाहा मूल गँवाइ । साहिब की गति अगम है, सो कुछ लखी न जाइ ॥ 29 ॥ सजीवन साहिब मिलै तो जीविये, नहीं तो जीवै नांहि । भावै अनंत उपाय कर, दादू मूवों मांहि ॥ 30 ॥ सजीविन साधै नहीं, तातैं मर मर जाइ । दादू पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ ॥ 31 ॥ दिन दिन लहुड़े होंहि सब, कहैं मोटा होता जाइ । दादू दिन दिन ते बढ़ें, जे रहैं राम ल्यौ लाइ ॥ 32 ॥ न जाणूं हाँजी, चुप गह, मेट अग्नि की झाल । सदा सजीवन सुमिरिये, दादू बंचै काल ॥ 33 ॥ जीवन मुक्ति दादू जीवित छूटै देह गुण, जीवित मुक्ता होइ । जीवित काटै कर्म सब, मुक्ति कहावै सोइ ॥ 34 ॥ दादू जीवित ही दुस्तर तिरे, जीवित लंघे पार । जीवित पाया जगद्गुरु, दादू ज्ञान विचार ॥ 35 ॥ जीवित जगपति को मिलै, जीवित आत्मराम । जीवित दर्शन देखिये, दादू मन विश्राम ॥ 36 ॥ जीवित पाया प्रेम रस, जीवित पिया अघाइ । जीवित पाया स्वाद सुख, दादू रहे समाइ ॥ 37 ॥ जीवित भागे भ्रम सब, छूटे कर्म अनेक। जीवित मुक्त सद्गति भये, दादू दर्शन एक ॥ 38 ॥

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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26 जीवित मेला ना भया, जीवित परस न होइ। जीवित जगपति ना मिले, दादू बूड़े सोइ ॥ 39 ॥ जीवित दुस्तर ना तिरे, जीवित न लंघे पार। जीवित निर्भय ना भये, दादू ते संसार ॥ 40 ॥ जीवित प्रकट ना भया, जीवित परिचय नांहि। जीवित न पाया पीव को, बूड़े भवजल मांहि ॥ 41 ॥ जीवित पद पाया नहीं, जीवित मिले न जाइ। जीवित जे छूटे नहीं, दादू गये विलाइ ॥ 42 ॥ दादू छूटे जीवतां, मूवाँ छूटे नांहि। मूवाँ पीछे छूटिये, तो सब आये उस मांहि ॥ 43 ॥ मूवाँ पीछे मुक्ति बतावैं, मूवाँ पीछे मेला। मूवाँ पीछे अमर अभय पद, दादू भूले गहिला ॥ 44 ॥ मूवाँ पीछे वैकुंठ वासा, मूवाँ स्वर्ग पठावैं। मूवाँ पीछे मुक्ति बतावैं, दादू जग बोरावैं ॥ 45 ॥ मूवाँ पीछे पद पहुँचावैं, मूवाँ पीछे तारैं। मूवाँ पीछे सद्गति होवै, दादू जीवित मारैं ॥ 46 ॥ मूवाँ पीछे भक्ति बतावैं, मूवाँ पीछे सेवा। मूवाँ पीछे संयम राखैं, दादू दोजख देवा ॥ 47 ॥ सजीवन दादू धरती क्या साधन किया, अंबर कौन अभ्यास ? रवि शशि किस आरंभ तैं ? अमर भये निज दास ॥ 48 ॥ साहिब मारे ते मुये, कोई जीवै नांहि। साहिब राखे ते रहे, दादू निज घर मांहि ॥ 49 ॥ जे जन राखे राम जी, अपने अंग लगाइ। दादू कुछ व्यापै नहीं, जे कोटि काल झख जाइ ॥ 50 ॥

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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26 इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरू-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य छब्बीसवां सजीवन का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 26 ॥ साखी 50 ॥

दादूराम सत्यराम

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पारिख का अंग www.dadooram.org अथ पारिख का अंग २७ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ साधुत्व परीक्षा दादू मन चित आतम देखिये, लागा है किस ठौर? जहँ लागा तैसा जाणिये, का देखै दादू और ॥ 2 ॥ दादू साधु परखिये, अन्तर आतम देख । मन मांहि माया रहै, कै आपै आप अलेख ॥ 3 ॥ दादू मन की देख कर, पीछे धरिये नांव । अन्तरगति की जे लखैं, तिनकी मैं बलि जांव ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27 यहु परख सराफी ऊपली, भीतर की यहु नांहि । अन्तर की जाणैं नहीं, ता तैं खोटा खांहि ॥ 5 ॥ दादू बाहर का सब देखिये, भीतर लख्या न जाइ । बाहर दिखावा लोक का, भीतर राम दिखाइ ॥ 6 ॥ दादू जे नांही सो सब कहैं, है सो कहै न कोइ । खोटा खरा परखिये, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥ 7 ॥ दह दिशि फिरै सो मन है, आवै जाइ सो पवन । राखणहारा प्राण है, देखणहारा ब्रह्म ॥ 8 ॥ घट की भान अनीति सब, मन की मेट उपाध । दादू परिहर पंच की, राम कहैं ते साध ॥ 9 ॥ अर्थ आया तब जानिये, जब अनर्थ छूटे । दादू भाँडा भरम का, गिरि चौड़े फूटे ॥ 10 ॥ दादू दूजा कहबे को रह्या, अन्तर डारा धोइ । ऊपर की ये सब कहैं, मांहि न देखै कोइ ॥ 11 ॥ दादू जैसे मांहि जीव रहै, तैसी आवै बास । मुख बोले तब जानिये, अन्तर का परकास ॥ 12 ॥ दादू ऊपर देख कर, सबको राखै नांव । अंतरगति की जे लखैं, तिनकी मैं बलि जांव ॥ 13 ॥ जग जन विपरीत तन मन आत्म एक है, दूजा सब उनहार । दादू मूल पाया नहीं, दुविधा भ्रम विकार ॥ 14 ॥ काया के सब गुण बँधे, चौरासी लख जीव । दादू सेवक सो नहीं, जे रंग राते पीव ॥ 15 ॥ काया के वश जीव सब, ह्वै गये अनन्त अपार । दादू काया वश करै, निरंजन निराकार ॥ 16 ॥

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श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27 पूरण ब्रह्म विचारिये, तब सकल आत्मा एक। काया के गुण देखिये, तो नाना वरण अनेक ॥ 17 ॥ नरबिड़ रूप पशु मति बुद्धि विवेक विचार बिन, माणस पशु समान। समझायां समझै नहीं, दादू परम गियान ॥ 18 ॥ सब जीव प्राणी भूत हैं, साधु मिलैं तब देव। ब्रह्म मिलै तब ब्रह्म हैं, दादू अलख अभेव ॥ 19 ॥ करतूती कर्म दादू बँध्या जीव है, छूटा ब्रह्म समान। दादू दोनों देखिये, दूजा नांही आन ॥ 20 ॥ कर्मों के वश जीव है, कर्म रहित सो ब्रह्म। जहँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू भागा भ्रम ॥ 21 ॥ पारिख अपारिख काचा उछलै ऊफणै, काया हाँडी मांहि। दादू पाका मिल रहै, जीव ब्रह्म द्वै नांहि ॥ 22 ॥ दादू बाँधे सुर नवाये बाजैं, एह्वा शोध रु लीज्यो। राम स्नेही साधु हाथे, वेगा मोकल दीज्यो ॥ 23 ॥ प्राण जौहरी पारिखु, मन खोटा ले आवै। खोटा मन के माथे मारै, दादू दूर उड़ावै ॥ 24 ॥ सांच श्रवणां हैं, नैनां नहीं, तातैं खोटा खाहिं। ज्ञान विचार न उपजै, साच झूठ समझाहिं ॥ 25 ॥ सांच दादू साचा लीजिये, झूठा दीजे डार। साचा सन्मुख राखिये, झूठा नेह निवार ॥ 26 ॥

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श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27 साचे को साचा कहै, झूठे को झूठा। दादू दुविधा को नहीं, ज्यों था त्यों दीठा ॥ 27 ॥ पारिख अपारिख दादू हीरे को कंकर कहैं, मूरख लोग अजान। दादू हीरा हाथ ले, परखैं साधु सुजान ॥ 28 ॥ हीरा कौड़ी ना लहै, मूरख हाथ गँवार। पाया पारख जौहरी, दादू मोल अपार ॥ 29 ॥ अंधे हीरा परखिया, किया कौडी मोल। दादू साधू जौहरी, हीरे मोल न तोल ॥ 30 ॥ सगुरा निगुरा सगुरा निगुरा परखिये, साध कहैं सब कोइ। सगुरा साचा, निगुरा झूठा, साहिब के दर होइ ॥ 31 ॥ सगुरा सत संयम रहै, सन्मुख सिरजनहार। निगुरा लोभी लालची, भूंचै विषय विकार ॥ 32 ॥ कर्त्ता कसौटी खोटा खरा परखिये, दादू कस-कस लेइ। साचा है सो राखिये, झूठा रहण न देइ ॥ 33 ॥ पारिख अपारिख खोटा खरा कर देवै पारिख, तो कैसे बन आवै। खरे खोटा का न्याय नबेरे, साहिब के मन भावै ॥ 34 ॥ दादू जिन्हें ज्यों कही, तिन्हें त्यों मानी, ज्ञान विचार न कीन्हा। खोटा खरा जीव परख न जानै, झूठ सच करि लीन्हा ॥ 35 ॥ कर्त्ता कसौटी जे निधि कहीं न पाइये, सो निधि घर-घर आहि। दादू महँगे मोल बिन, कोई न लेवे ताहि ॥ 36 ॥

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श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27 खरी कसौटी कीजिये, वाणी बधती जाइ। दादू साचा परखिये, महँगे मोल बिकाइ ॥ 37 ॥ दादू राम कसै सेवक खरा, कदे न मोड़ै अंग। दादू जब लग राम है, तब लग सेवक संग ॥ 38 ॥ दादू कस कस लीजिये, यहु ताते परिमान। खोटा गाँठ न बाँधिये, साहिब के दीवान ॥ 39 ॥ खरी कसौटी पीव की, कोई बिरला पहुँचनहार। जे पहुँचे ते ऊबरे, ताइ किये तत सार ॥ 40 ॥ दुर्बल देही निर्मल वाणी, दादू पंथी ऐसा जाणी। काहू जीव विरोधे नांही, परमेश्वर देखे सब माँही ॥ 41 ॥ दादू साहिब कसै सेवक खरा, सेवक को सुख होइ। साहिब करै सो सब भला, बुरा न कहिये कोइ ॥ 42 ॥ दादू ठग आमेर में, साधौं सौं कहियो। हम शरणाई राम की, तुम नीके रहियो ॥ 43 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य सत्ताईसवां पारिख कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 27 ॥ साखी 43 ॥

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उपजन का अंग अथ उपजन का अंग २८ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ।। 1 ।। विचार दादू माया का गुण बल करै, आपा उपजै आइ । राजस तामस सात्विकी, मन चंचल ह्रै जाइ ।। 2 ।। आपा नाहीं बल मिटै, त्रिविध तिमिर नहिं कोइ । दादू यहु गुण ब्रह्म का, शून्य समाना सोइ ।। 3 ।।

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श्री दादूवाणी-उपजन का अंग 28 उपजन दादू अनुभव उपजी गुणमयी, गुण ही पै ले जाइ। गुण ही सौं गहि बंधिया, छूटै कौन उपाइ ॥ 4 ॥ द्वै पख उपजी परिहरै, निर्पख अनुभव सार। एक राम दूजा नहीं, दादू लेहु विचार ॥ 5 ॥ दादू काया ब्यावर गुणमयी, मनमुख उपजै ज्ञान। चौरासी लख जीव को, इस माया का ध्यान ॥ 6 ॥ आत्म उपज आकाश की, सुनि धरती की बाट। दादू मारग गैब का, कोई लखै न घाट ॥ 7 ॥ आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होइ। दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोइ ॥ 8 ॥ प्रेम भक्ति जब ऊपजै, निश्चल सहज समाधि। दादू पीवे राम रस, सतगुरु के प्रसाद ॥ 9 ॥ प्रेम भक्ति जब ऊपजै, पंगुल ज्ञान विचार। दादू हरि रस पाइये, छूटै सकल विकार ॥ 10 ॥ दादू बंझ बियाई आत्मा, उपज्या आनन्द भाव। सहज शील संतोष सत, प्रेम मगन मन राव ॥ 11 ॥ निन्दा जब हम ऊजड़ चालते, तब कहते मारग मांहि। दादू पहुंचे पंथ चल, कहैं यहु मारग नांहि ॥ 12 ॥ उपजन पहले हम सब कुछ किया, भरम करम संसार। दादू अनुभव उपजी, राते सिरजनहार ॥ 13 ॥ सोई अनुभव सोई ऊपजी, सोई शब्द तव सार। सुनतां ही साहिब मिले, मन के जाहिं विकार ॥ 14 ॥

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श्री दादूवाणी-उपजन का अंग 28 परिचय जिज्ञासा उपदेश पारब्रह्म कह्या प्राण सौं, प्राण कह्या घट सोइ । दादू घट सब सौं कह्या, विष अमृत गुण दोइ ॥ 15 ॥ दादू मालिक कह्या अरवाह सौं, अरवाह कह्या औजूद । औजूद आलम सौं कह्या, हुकम खबर मौजूद ॥ 16 ॥ दादू जैसा ब्रह्म है, तैसी अनुभव उपजी होइ । जैसा है तैसा कहै, दादू विरला कोइ ॥ 17 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य अट्ठाईसवां उपजन काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 28 ॥ साखी 17 ॥

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दया निर्वैरता का अंग www.dadooram.org अथ दया निर्वैरता का अंग २९ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ सारमत आपा मेटै हरि भजै, तन मन तजै विकार । निर्वैरी सब जीव सौं, दादू यहु मत सार ॥ 2 ॥ दादू निर्वैरी निज आत्मा, साधन का मत सार । दादू दूजा राम बिन, बैरी मंझ विकार ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29 निर्वैरी सब जीव सौं, संतजन सोई । दादू एकै आत्मा, बैरी नहिं कोई ॥ 4 ॥ सब हम देख्या शोध कर, दूजा नांही आन । सब घट एकै आत्मा, क्या हिन्दू मुसलमान ॥ 5 ॥ दादू नारी पुरुष का नाम धर, इहि संशय भ्रम भुलान । सब घट एकै आत्मा, क्या हिंदू मुसलमान ॥ 6 ॥ दादू दोनों भाई हाथ पग, दोनों भाई कान । दोनों भाई नैन हैं, हिंदू मुसलमान ॥ 7 ॥ दादू संशय आरसी, देखत दूजा होइ । भ्रम गया दुविधा मिटी, तब दूसर नाहिं कोइ ॥ 8 ॥ किस सौं बैरी ह्वै रह्या, दूजा कोई नांहि । जिसके अंग तैं ऊपजै, सोई है सब मांहि ॥ 9 ॥ सब घट एकै आत्मा, जानै सो नीका । आपा पर में चीन्ह ले, दर्शन है पीव का ॥ 10 ॥ काहे को दुख दीजिये, घट घट आत्माराम । दादू सब संतोषिये, यह साधु का काम ॥ 11 ॥ काहे को दुख दीजिये, साँई है सब मांहि । दादू एकै आत्मा, दूजा कोई नांहि ॥ 12 ॥ साहिब जी की आत्मा, दीजे सुख संतोंष । दादू दूजा को नहीं, चौदह तीनों लोक ॥ 13 ॥ दादू जब प्राण पिछाणै आपको, आत्म सब भाई । सिरजनहारा सबनि का, तासौं ल्यौ लाई ॥ 14 ॥ आत्माराम विचार कर, घट घट देव दयाल । दादू सब संतोषिये, सब जीवों प्रतिपाल ॥ 15 ॥ दादू पूरण ब्रह्म विचारले, द्वैत भाव कर दूर । सब घट साहिब देखिये, राम रह्या भरपूर ॥ 16 ॥

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श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29 दादू मंदिर काँच का, मर्कट सुनहाँ जाइ । दादू एक अनेक है, आप आपको खाइ ॥ 17 ॥ आत्म भाई जीव सब, एक पेट परिवार । दादू मूल विचारिये, तो दूजा कौन गँवार ॥ 18 ॥ दादू सूखा सहजैं कीजिये, नीला भानै नांहि । काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥ 19 ॥ दया निर्वैरता घट घट के उनहार सब, प्राण परस है जाइ । दादू एक अनेक है, बरतैं नाना भाइ ॥ 20 ॥ आये एकंकार सब, साँई दिये पठाइ । दादू न्यारे नांम धर, भिन्न भिन्न है जाइ ॥ 21 ॥ आये एकंकार सब, साँई दिये पठाइ । आदि अंत सब एक है, दादू सहज समाइ ॥ 22 ॥ आतम देव आराजिये, विरोधिये नहिं कोइ । आराधे सुख पाइये, विरोधे दुःख होइ ॥ 23 ॥ ज्यों आपै देखे आपको, यों जे दूसर होइ । तो दादू दूसर नहीं, दुःख न पावै कोइ ॥ 24 ॥ दादू सम कर देखिये, कुंजर कीट समान । दादू दुविधा दूर कर, तज आपा अभिमान ॥ 25 ॥ अदया हिंसा दादू अर्श खुदाय का, अजरावर का थान । दादू सो क्यों ढाहिये, साहिब का नीशान ॥ 26 ॥ दादू आप चिणावै देहुरा, तिसका करहि जतन । प्रत्यक्ष परमेश्वर किया, सो भानै जीव रतन ॥ 27 ॥ मसीत संवारी माणसाँ, तिसको करैं सलाम । ऐन आप पैदा किया, सो ढाहैं मुसलमान ॥ 28 ॥

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श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29 दादू जंगल मांही जीव जे, जग तैं रहैं उदास। भयभीत भयानक रात दिन, निश्चल नाहीं वास ॥ 29 ॥ वाचा बंधी जीव सब, भोजन पानी घास। आत्म ज्ञान न ऊपजै, दादू करहि विनास ॥ 30 ॥ काला मुँह कर करद का, दिल तैं दूर निवार। सब सूरत सुबहान की, मुल्लां मुग्ध न मार ॥ 31 ॥ गला गुस्से का काटिये, मियाँ मनी को मार। पंचों बिस्मिल कीजिये, ये सब जीव उबार ॥ 32 ॥ वैर विरोधे आत्मा, दया नहीं दिल मांहि। दादू मूरति राम की, ताको मारन जांहि ॥ 33 ॥ दया निर्वैरता कुल आलम यके दीदम, अरवाहे इखलास। बद अमल बदकार दुई, पाक यारां पास ॥ 34 ॥ काल झाल तैं काढ कर, आतम अंग लगाइ। जीव दया यहु पालिये, दादू अमृत खाइ ॥ 35 ॥ दादू बुरा न बांछै जीव का, सदा सजीवन सोइ। परलै विषय विकार सब, भाव भक्ति रत होइ ॥ 36 ॥ सतगुरु संतों की यह रीत, आत्म भाव सौं राखैं प्रीत। ना को बैरी ना को मीत, दादू राम मिलन की चीत ॥ 37 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य उन्तीसवां दया निर्वैरता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 29 ॥ साखी 37 ॥

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