भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-उपजन का अंग 28 उपजन दादू अनुभव उपजी गुणमयी, गुण ही पै ले जाइ। गुण ही सौं गहि बंधिया, छूटै कौन उपाइ ॥ 4 ॥ द्वै पख उपजी परिहरै, निर्पख अनुभव सार। एक राम दूजा नहीं, दादू लेहु विचार ॥ 5 ॥ दादू काया ब्यावर गुणमयी, मनमुख उपजै ज्ञान। चौरासी लख जीव को, इस माया का ध्यान ॥ 6 ॥ आत्म उपज आकाश की, सुनि धरती की बाट। दादू मारग गैब का, कोई लखै न घाट ॥ 7 ॥ आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होइ। दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोइ ॥ 8 ॥ प्रेम भक्ति जब ऊपजै, निश्चल सहज समाधि। दादू पीवे राम रस, सतगुरु के प्रसाद ॥ 9 ॥ प्रेम भक्ति जब ऊपजै, पंगुल ज्ञान विचार। दादू हरि रस पाइये, छूटै सकल विकार ॥ 10 ॥ दादू बंझ बियाई आत्मा, उपज्या आनन्द भाव। सहज शील संतोष सत, प्रेम मगन मन राव ॥ 11 ॥ निन्दा जब हम ऊजड़ चालते, तब कहते मारग मांहि। दादू पहुंचे पंथ चल, कहैं यहु मारग नांहि ॥ 12 ॥ उपजन पहले हम सब कुछ किया, भरम करम संसार। दादू अनुभव उपजी, राते सिरजनहार ॥ 13 ॥ सोई अनुभव सोई ऊपजी, सोई शब्द तव सार। सुनतां ही साहिब मिले, मन के जाहिं विकार ॥ 14 ॥

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