सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 तिल तिल का अपराधी तेरा,रती रती का चोर । पल पल का मैं गुनही तेरा, बख्शो अवगुण मोर ॥ 5 ॥ महा अपराधी एक मैं, सारे इहि संसार । अवगुण मेरे अति घणे, अन्त न आवैं पार ॥ 6 ॥ बे मर्यादा मित नहीं, ऐसे किये अपार । मैं अपराधी बापजी, मेरे तुम्हीं एक अधार ॥ 7 ॥ दोष अनेक कलंक सब, बहुत बुरे मुझ मांहि । मैं किये अपराध सब, तुम तैं छाना नांहि ॥ 8 ॥ गुनहगार अपराधी तेरा, भाजि कहाँ हम जाहिं । दादू देख्या शोध सब, तुम बिन कहीं न समाहिं ॥ 9 ॥ आदि अंत लौं आय कर, सुकृत कछू न कीन्ह । माया मोह मद मत्सरा, स्वाद सबै चित दीन्ह ॥ 10 ॥ विनती काम क्रोध संशय सदा, कबहूँ नाम न लीन । पाखंड प्रपंच पाप में, दादू ऐसे खीन ॥ 11 ॥ दादू बहु बंधन सौं बंधिया, एक बिचारा जीव । अपने बल छूटै नहीं, छोड़नहारा पीव ॥ 12 ॥ दादू बंदीवान है, तूँ बन्दी छोड़ दीवान । अब जनि राखो बंदि में, मीरां मेहरबान ॥ 13 ॥ दादू अंतर कालिमा, हिरदै बहुत विकार । प्रकट पूरा दूर कर, दादू करै पुकार ॥ 14 ॥ सब कुछ व्यापै राम जी, कुछ छूटा नांही । तुम तैं कहाँ छिपाइये, सब देखो मांही ॥ 15 ॥ सबल साल मन में रहै, राम बिसर क्यों जाइ । यहु दुख दादू क्यों सहै, साँई करो सहाइ ॥ 16 ॥
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